कच्चे तेल की कीमतों में फिर बड़ा उछाल! अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव 105 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है। ईरान-अमेरिका तनाव के बीच क्या भारत में पेट्रोल-डीजल भी महंगा होगा? जानिए पूरा मामला।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। ईरान और अमेरिका के बीच दोबारा शुरू हुए सैन्य संघर्ष का असर ग्लोबल ऑयल मार्केट पर साफ दिखाई दे रहा है। कच्चे तेल की कीमत बढ़कर करीब 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। तेल की कीमतों में यह तेजी ऐसे समय आई है, जब दुनिया पहले से ही पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर नजर बनाए हुए है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव का असर उन देशों पर ज्यादा पड़ता है, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करके पूरा करते हैं। भारत भी इन्हीं देशों में शामिल है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर टिकी दुनिया की नजर……
कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की अहम भूमिका है। पश्चिम एशिया से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक बड़ी मात्रा में तेल इसी समुद्री रास्ते से पहुंचता है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या तेल की सप्लाई प्रभावित होने का खतरा पैदा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत तेजी से ऊपर जा सकती है। भारत के लिए भी यह चिंता का विषय है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है।
क्या भारत में बढ़ेंगे पेट्रोल और डीजल के दाम…..?
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत में पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं?इसका सीधा जवाब फिलहाल देना मुश्किल है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से भारत पर दबाव जरूर बढ़ता है, लेकिन घरेलू ईंधन की कीमतें कई दूसरे आर्थिक और नीतिगत कारकों पर भी निर्भर करती हैं। इससे पहले कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी के दौरान मई में पेट्रोल और डीजल के दाम में कई बार बढ़ोतरी देखने को मिली थी। इसलिए मौजूदा हालात में भी ईंधन की कीमतों को लेकर बाजार में अटकलें तेज हो गई हैं। भारत अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदता है। इसका मतलब है कि देश किसी एक सप्लाई रूट या एक ही देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। इसके अलावा देश में पर्याप्त ईंधन भंडार बनाए रखने की कोशिश भी की जाती है, जिससे अचानक पैदा होने वाली सप्लाई की परेशानी से निपटा जा सके।
कच्चा तेल महंगा होने से रुपये पर भी दबाव……
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव भारतीय रुपये और देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। कच्चे तेल का आयात करने के लिए भारत को बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। ऐसे में तेल की कीमत बढ़ने पर डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिससे रुपये पर दबाव आ सकता है। गुरुवार को भारतीय रुपया करीब 0.2 फीसदी कमजोर होकर 95.30 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। यह लगभग 10 दिनों में रुपये का सबसे कमजोर स्तर बताया गया है।
महंगे तेल का आम आदमी पर कैसे पड़ता है असर……?
अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों पर देखने को मिल सकता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होने पर परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसका असर सामान की ढुलाई से लेकर रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में 105 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा सिर्फ तेल कंपनियों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका असर आने वाले दिनों में आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सबकी नजर इस बात पर है कि ईरान-अमेरिका तनाव आगे किस दिशा में जाता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कितने समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं।
