बिहार बनाम झारखंड: आखिर बंटवारे के बाद दोनों राज्यों की आर्थिक तस्वीर इतनी अलग क्यों हो गई? 📊 बिहार का राजकोषीय घाटा 5.8% और झारखंड का 1.2% बताया गया है। जानिए खनिज, उद्योग, रोजगार और पलायन ने कैसे बदली दोनों राज्यों की कहानी।

बिहार और झारखंड आज भले ही दो अलग-अलग राज्य हैं, लेकिन करीब 26 साल पहले तक दोनों एक ही राज्य बिहार का हिस्सा थे। 15 नवंबर 2000 को बिहार के दक्षिणी हिस्से को अलग करके झारखंड को देश का 28वां राज्य बनाया गया। इस बंटवारे के बाद दोनों राज्यों की आर्थिक संरचना और विकास की दिशा काफी अलग हो गई। आज बिहार को रोजगार, गरीबी और पलायन जैसी चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है, जबकि झारखंड को देश के प्रमुख खनिज और औद्योगिक राज्यों में गिना जाता है। हालिया आंकड़ों में भी दोनों राज्यों की वित्तीय स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
राजकोषीय घाटे में बिहार सबसे ऊपर, झारखंड सबसे नीचे….
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट ‘सीइंग लाइक ए स्टेट’ के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में 17 प्रमुख राज्यों में बिहार का राजकोषीय घाटा सबसे ज्यादा रहा। बिहार का राजकोषीय घाटा उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का करीब 5.8 फीसदी रहा। इसके उलट झारखंड का राजकोषीय घाटा सिर्फ 1.2 फीसदी रहा, जो रिपोर्ट में शामिल राज्यों में सबसे कम बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इन 17 राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा 2025-26 में GSDP के करीब 3.2 फीसदी रहा। वहीं 10 राज्यों का घाटा 3 फीसदी से अधिक रहा। हालांकि, केवल राजकोषीय घाटे के आंकड़े से किसी राज्य की पूरी आर्थिक तस्वीर नहीं समझी जा सकती। राज्य की आय, खर्च, कर्ज, प्राकृतिक संसाधन, उद्योग और रोजगार जैसे कई कारक इसकी वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं।
2000 के बंटवारे ने बदल दी आर्थिक तस्वीर….
बिहार और झारखंड के आर्थिक अंतर को समझने के लिए साल 2000 के बंटवारे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बंटवारे के बाद कोयला, लौह अयस्क और अन्य महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों वाले कई क्षेत्र झारखंड के हिस्से में चले गए। इसके साथ ही जमशेदपुर, बोकारो और धनबाद जैसे औद्योगिक क्षेत्र भी झारखंड में रह गए। इसका सीधा असर दोनों राज्यों की आर्थिक संरचना पर पड़ा। झारखंड को खनन और भारी उद्योगों का मजबूत आधार मिला, जबकि बिहार की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और सर्विस सेक्टर पर निर्भर हो गई। हालांकि, आज दोनों राज्यों की वित्तीय स्थिति के लिए सिर्फ 2000 का बंटवारा जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। पिछले ढाई दशकों में निवेश, औद्योगिक विकास, सरकारी खर्च, राजस्व संग्रह, कर्ज और रोजगार के अवसरों ने भी दोनों राज्यों की स्थिति को प्रभावित किया है।
झारखंड के पास खनिजों की बड़ी ताकत….
झारखंड की अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी भूमिका है। राज्य कोयला, लौह अयस्क, तांबा, बॉक्साइट, यूरेनियम और अभ्रक जैसे खनिजों के लिए जाना जाता है। जमशेदपुर और बोकारो जैसे शहरों में बड़े औद्योगिक एवं इस्पात केंद्र हैं, जबकि धनबाद कोयला उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। खनन और इससे जुड़े उद्योग राज्य की आय और आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। बताया जाता है कि खनन रॉयल्टी झारखंड के अपने राजस्व में भी महत्वपूर्ण हिस्सा रखती है। यही प्राकृतिक संसाधन राज्य को बिहार की तुलना में अलग आर्थिक आधार देते हैं।
बिहार की अर्थव्यवस्था कृषि और सर्विस सेक्टर पर निर्भर….
दूसरी तरफ बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि और सर्विस सेक्टर की बड़ी भूमिका है। राज्य में बड़ी संख्या में लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। बिहार सरकार औद्योगिक निवेश बढ़ाने के लिए इथेनॉल, फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल और लेदर जैसे क्षेत्रों पर जोर दे रही है। प्लग-एंड-प्ले इंडस्ट्रियल पार्क जैसी योजनाओं के जरिए निजी निवेश आकर्षित करने की कोशिश भी की जा रही है। लेकिन बड़े पैमाने पर भारी उद्योगों की कमी अभी भी राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।
रोजगार के लिए बिहार से बड़े पैमाने पर पलायन….
बिहार की आर्थिक चुनौतियों का सबसे बड़ा असर रोजगार के मोर्चे पर दिखाई देता है। बेहतर नौकरी और आय की तलाश में बड़ी संख्या में लोग दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और अन्य राज्यों की ओर जाते हैं। कृषि पर निर्भरता और बड़े औद्योगिक रोजगार की सीमित उपलब्धता पलायन की प्रमुख वजहों में शामिल हैं। झारखंड में भी पलायन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। खासकर ग्रामीण, आदिवासी बहुल और असंगठित क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण लोगों को दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। यानी खनिज संपदा होने के बावजूद झारखंड के सामने भी स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने की चुनौती बनी हुई है।
झारखंड को खनिज मिले, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं….
यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि झारखंड को बंटवारे के बाद केवल फायदा ही हुआ। प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद राज्य को गरीबी, बेरोजगारी, क्षेत्रीय असमानता और बुनियादी सुविधाओं जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। खनिज आधारित अर्थव्यवस्था की अपनी सीमाएं भी हैं। खनन गतिविधियां वैश्विक बाजार की कीमतों और मांग से प्रभावित होती हैं। साथ ही पर्यावरण, विस्थापन और स्थानीय समुदायों से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों को स्थायी आर्थिक विकास में बदलना झारखंड के लिए बड़ी चुनौती है।
राज्यों पर बढ़ रहा कर्ज का दबाव….
क्रिसिल की रिपोर्ट ने राज्यों के बढ़ते कर्ज को भी चिंता का विषय बताया है। 2025-26 के बजट अनुमानों के अनुसार राज्यों का कुल कर्ज GSDP के करीब 29.2 फीसदी तक पहुंच गया, जबकि 2024 में यह लगभग 28.1 फीसदी था। बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और केरल जैसे राज्यों में राजकोषीय घाटे के साथ कर्ज का दबाव भी ज्यादा बताया गया है। इसका मतलब है कि राज्यों के सामने एक तरफ विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बढ़ाने की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ कर्ज और ब्याज के बोझ को नियंत्रित रखना भी जरूरी है।
बाजार से कर्ज लेने पर बढ़ी निर्भरता….
रिपोर्ट के मुताबिक 2025-26 में राज्यों की कुल बाजार उधारी 19 फीसदी से अधिक बढ़कर करीब 12.76 लाख करोड़ रुपये हो गई। कुछ साल पहले तक राज्यों के घाटे को पूरा करने में बाजार से मिलने वाले कर्ज की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम थी। अब यह हिस्सेदारी बढ़कर करीब 76 फीसदी तक पहुंच गई है। इससे पता चलता है कि राज्यों के लिए अपने खर्च और विकास योजनाओं को वित्तपोषित करने में बाजार से कर्ज लेना महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।
आखिर बिहार और झारखंड में इतना अंतर क्यों….?
बिहार और झारखंड की मौजूदा आर्थिक स्थिति को एक ही कारण से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे कई दशकों की आर्थिक संरचना, प्राकृतिक संसाधन, औद्योगिक आधार, निवेश, रोजगार, राजस्व संग्रह और सरकारी खर्च जैसे कारक हैं। झारखंड को बंटवारे के बाद खनिज संपदा और भारी उद्योगों का मजबूत आधार मिला, जबकि बिहार के पास कृषि और सर्विस सेक्टर का बड़ा आधार रहा। लेकिन संसाधन होना अपने आप में विकास की गारंटी नहीं है। झारखंड के सामने स्थानीय रोजगार और क्षेत्रीय असमानता जैसी चुनौतियां हैं, वहीं बिहार के लिए उद्योग, निवेश और रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना अहम है। आने वाले वर्षों में दोनों राज्यों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अपनी मौजूदा आर्थिक ताकत का कितना बेहतर इस्तेमाल करते हैं और राजस्व, कर्ज तथा विकास खर्च के बीच कितना संतुलन बना पाते हैं।
निष्कर्ष: 2000 का बंटवारा बिहार और झारखंड की आर्थिक कहानी का एक महत्वपूर्ण मोड़ जरूर था, लेकिन आज की स्थिति केवल उसी का नतीजा नहीं है। झारखंड की खनिज और औद्योगिक ताकत तथा बिहार की कृषि और सेवा आधारित अर्थव्यवस्था—दोनों की अपनी अलग संभावनाएं और चुनौतियां हैं। असली सवाल यह है कि आने वाले वर्षों में दोनों राज्य अपनी आर्थिक क्षमता को रोजगार और बेहतर जीवन स्तर में कितनी तेजी से बदल पाते हैं।
