प्रस्तावना

बीजिंग में आयोजित द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ पर दुनिया ने एक दुर्लभ दृश्य देखा—किम जोंग उन, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग एक ही मंच पर खड़े थे। इस तस्वीर ने न सिर्फ एशियाई भू-राजनीति का नया संकेत दिया, बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए एक गंभीर संदेश भी भेजा।
किम और पुतिन ने चीन की सैन्य परेड के बाद विशेष बैठक कर दीर्घकालिक सहयोग योजनाओं पर चर्चा की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन-अमेरिका तनाव और कोरियाई प्रायद्वीप की सुरक्षा स्थिति वैश्विक एजेंडे पर हावी हैं।
किम-पुतिन-शी: नई धुरी का संकेत?
बीजिंग में तियानमेन चौक पर आयोजित समारोह में तीनों नेताओं की मौजूदगी को अमेरिका के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन माना जा रहा है।
- पुतिन ने इसे “विश्वास और मित्रता पर आधारित विशेष संबंध” कहा।
- किम जोंग ने रूस को समर्थन देना अपना “भाईचारे का कर्तव्य” बताया।
- शी जिनपिंग की चुप्पी और रणनीतिक उपस्थिति ने इस गठजोड़ को और मजबूती दी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तस्वीर वैश्विक राजनीति में एक “पूर्वी ध्रुव” के उदय की घोषणा थी, जिसका सीधा असर अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति पर पड़ेगा।
किम-पुतिन वार्ता की मुख्य बातें
उत्तर कोरिया की सरकारी एजेंसी KCNA और रूस की तास समाचार एजेंसी ने इस मुलाकात से जुड़े कई अहम बिंदु बताए:
- दीर्घकालिक सहयोग योजनाओं पर विस्तार से चर्चा।
- ऊर्जा, सैन्य और कूटनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की प्रतिबद्धता।
- यूक्रेन युद्ध में उत्तर कोरियाई सैनिकों की भूमिका की प्रशंसा।
- रूस ने किम को फिर से मॉस्को आने का निमंत्रण दिया।
यह बैठक इसलिए खास थी क्योंकि इसमें दोनों नेताओं ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देने की साझा इच्छा भी जताई।
उत्तर कोरिया की सैन्य भूमिका

दक्षिण कोरिया की राष्ट्रीय खुफिया सेवा (NIS) के मुताबिक:
- अक्टूबर 2024 से अब तक लगभग 15,000 उत्तर कोरियाई सैनिक रूस भेजे जा चुके हैं।
- तीसरे बैच में और 6,000 सैनिक भेजने की योजना है।
- लगभग 2,000 सैनिक युद्ध में मारे गए हैं।
पुतिन ने साफ कहा कि “कुर्स्क क्षेत्र की मुक्ति में उत्तर कोरियाई सैनिकों का योगदान किम की व्यक्तिगत पहल से प्रेरित था।” यह बयान दोनों देशों के बीच गहरे सैन्य सहयोग को उजागर करता है।
चीन की भूमिका
हालांकि इस बैठक में मुख्य बातचीत किम और पुतिन के बीच हुई, लेकिन शी जिनपिंग की उपस्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही।
- चीन पहले से ही रूस का रणनीतिक साझेदार है।
- उत्तर कोरिया पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद बीजिंग उसे कूटनीतिक छत्रछाया देता है।
- अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति का जवाब देने के लिए चीन-रूस-उत्तर कोरिया की धुरी एक प्रभावी संतुलन बन सकती है।
अमेरिका की चिंता
अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए यह त्रिकोणीय समीकरण बेहद चिंताजनक है।
- एक तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध है, जिसमें पश्चिमी देश लगातार हथियार और आर्थिक मदद दे रहे हैं।
- दूसरी तरफ चीन और अमेरिका के बीच व्यापार, ताइवान और दक्षिण चीन सागर को लेकर तनाव बढ़ रहा है।
- अब अगर उत्तर कोरिया भी रूस के साथ खुलकर खड़ा होता है तो यह अमेरिका की दो मोर्चों पर चुनौती बन जाएगा।
अमेरिकी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह गठजोड़ नाटो और अमेरिका की रणनीतिक बढ़त को कमजोर करने की कोशिश है।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं
इस बैठक और परेड में तीनों नेताओं की तस्वीर ने सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में व्यापक चर्चा छेड़ दी।
- यूरोपीय देशों ने इसे “लोकतांत्रिक देशों के खिलाफ अधिनायकवादी धुरी” बताया।
- दक्षिण कोरिया और जापान ने इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा कहा।
- रूस और उत्तर कोरिया की मीडिया ने इसे “नई विश्व व्यवस्था” का प्रतीक करार दिया।
विशेषज्ञों की राय
- भू-राजनीतिक विशेषज्ञ – मानते हैं कि यह मुलाकात अमेरिका की शक्ति संतुलन रणनीति को चुनौती है।
- सुरक्षा विश्लेषक – इसे कोरियाई प्रायद्वीप में अस्थिरता बढ़ाने वाला कदम मानते हैं।
- आर्थिक विशेषज्ञ – कहते हैं कि यदि यह धुरी मजबूत हुई तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर गहरा असर होगा।
निष्कर्ष
किम जोंग उन, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की नजदीकियां सिर्फ एक राजनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था की झलक हैं। यह समीकरण अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए कड़ी चुनौती बन सकता है।
प्रश्न यह है कि क्या यह धुरी सिर्फ प्रतीकात्मक है या वास्तव में एक नया भू-राजनीतिक गठबंधन आकार ले रहा है? आने वाले महीनों में इस पर दुनिया की नजरें टिकी रहेंगी।
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