जेब में सिर्फ 20 पैसे और आंखों में बड़ा सपना! जावेद अख्तर के संघर्ष की कहानी आज भी प्रेरणा देती है।

हिंदी सिनेमा में अपनी लेखनी से अलग मुकाम बनाने वाले जावेद अख्तर की जिंदगी आज जितनी शानदार नजर आती है, उसके पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है। मशहूर गीतकार और पटकथा लेखक ने मुंबई में अपने शुरुआती दिनों में बेहद मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया। कभी उनके पास रहने के लिए जगह नहीं होती थी, तो कभी अगला खाना कहां से मिलेगा, इसका भी भरोसा नहीं था। हाल ही में एक बातचीत में जावेद अख्तर ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए ऐसे कई किस्से साझा किए, जो बताते हैं कि कामयाबी तक पहुंचने का उनका सफर कितना कठिन था।
19 साल की उम्र में पहुंचे थे मुंबई….
कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद जावेद अख्तर महज 19 साल की उम्र में 1964 में मुंबई पहुंचे थे। उनके मन में पहले से ही तय था कि उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में काम करना है और किसी बड़े फिल्म निर्देशक के साथ बतौर सहायक काम करना है। उस समय उनकी पसंद में दो बड़े नाम थे—राज कपूर और गुरु दत्त। लेकिन मुंबई पहुंचने के बाद परिस्थितियां उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं रहीं। जावेद अख्तर के मुंबई आने के कुछ ही दिनों बाद गुरु दत्त का निधन हो गया। वहीं राज कपूर के साथ काम करने का उनका सपना भी पूरा नहीं हो सका।
छह साल तक चलता रहा संघर्ष….
मुंबई में शुरुआती करीब छह साल जावेद अख्तर के लिए बेहद कठिन रहे। उनके पास कोई स्थायी नौकरी नहीं थी और न ही रहने का कोई पक्का ठिकाना। कभी उन्हें रहने की जगह मिल जाती थी और कभी नहीं। कई बार ऐसा भी होता था कि सुबह उठने के बाद उन्हें पता नहीं होता था कि दोपहर या रात का खाना कहां से मिलेगा। उन्होंने छोटे-मोटे लेखन कार्य करने शुरू किए। फिल्मों के लिए घोस्ट राइटिंग भी की, लेकिन उस काम का उन्हें क्रेडिट नहीं मिलता था। एक सीन लिखने के लिए उन्हें करीब 100 रुपये तक मिलते थे और अगर 10 सीन लिखने होते तो करीब 1,000 रुपये की कमाई हो जाती थी। इसी तरह वह किसी तरह अपना गुजारा करते रहे।
जेब में बचे थे सिर्फ 20 पैसे….
जावेद अख्तर ने अपने संघर्ष का एक बेहद भावुक किस्सा भी सुनाया। एक बार उन्होंने एक प्रोड्यूसर के लिए करीब 10 सीन लिखे थे। प्रोड्यूसर ने अगले दिन उन्हें 1,000 रुपये देने का वादा किया था। अगले दिन जावेद पैसे लेने दादर स्थित प्रोड्यूसर के ऑफिस पहुंचे, लेकिन वहां पहुंचकर उन्हें पता चला कि ऑफिस बंद है। उस समय उनकी जेब में सिर्फ 20 नए पैसे थे। उनके सामने दो विकल्प थे। वह 20 पैसे खर्च करके बस से बांद्रा की तरफ जा सकते थे और बाकी रास्ता पैदल तय कर सकते थे या फिर उन्हीं पैसों से कुछ खा सकते थे। उन्होंने खाना चुना और उन पैसों से चना खरीद लिया। इसके बाद दादर से बांद्रा की तरफ पैदल निकल पड़े।
कोहिनूर मिल के पास देखा था एक सपना….
पैदल जाते समय जब जावेद अख्तर कोहिनूर मिल के पास पहुंचे तो उनके मन में एक विचार आया। उन्होंने उस जगह को देखकर कल्पना की कि एक दिन वह इसी रास्ते से अपनी कार में गुजरेंगे। उस वक्त उनके पास न पैसे थे, न काम की कोई गारंटी और न ही भविष्य की कोई निश्चितता। फिर भी उन्होंने अपने भविष्य को लेकर उम्मीद नहीं छोड़ी। शायद यही आत्मविश्वास उनके संघर्ष के दिनों की सबसे बड़ी ताकत था।
तीन दिन तक खाने के लिए भी नहीं थे पैसे….
जावेद अख्तर ने यह भी बताया कि उनके संघर्ष के दिनों में ऐसे मौके आए जब उन्हें लगातार कई दिनों तक खाना नहीं मिला। कभी रहने की जगह होती थी तो कभी नहीं। आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि अगले भोजन का भी भरोसा नहीं रहता था। उन्होंने बताया कि मुंबई में एक दरगाह के बारे में उन्हें पता था जहां जरूरतमंद लोगों को खाना मिलता था, लेकिन मुश्किल वक्त में भी यह विकल्प उनके दिमाग में नहीं आया। इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने सपने को छोड़ने के बारे में नहीं सोचा।
1970 में बदली जिंदगी की दिशा….
करीब छह साल तक संघर्ष करने के बाद 1970 में जावेद अख्तर की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। उनकी मुलाकात और साझेदारी सलीम खान के साथ हुई और यहीं से जन्म हुआ मशहूर लेखन जोड़ी सलीम-जावेद का। दोनों ने मिलकर हिंदी सिनेमा को ऐसी कहानियां और किरदार दिए, जिन्हें आज भी याद किया जाता है। जंजीर, दीवार, शोले, डॉन और त्रिशूल जैसी फिल्मों ने इस जोड़ी को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की सबसे प्रभावशाली लेखन जोड़ियों में शामिल कर दिया। जावेद अख्तर की कहानी इस बात की मिसाल है कि जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर में भी अगर इंसान अपने सपने और खुद पर भरोसा बनाए रखे, तो हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। कभी जेब में सिर्फ 20 पैसे होते हैं, लेकिन आंखों में भविष्य की पूरी तस्वीर हो सकती है।
