राजस्थान के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में एक खौफनाक हादसे ने सबको झकझोर दिया। बाघ का पिंजरा खुलने के बाद घास काट रही महिलाओं पर हमला हुआ, जिसमें सुगना देवी की जान चली गई।

क्या आप सोच सकते हैं कि एक रोज़मर्रा का साधारण दिन अचानक एक भयानक बुरे सपने में बदल सकता है? राजस्थान के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली घटना घटी, जिसने हर किसी को स्तब्ध कर दिया।
यह कहानी है सुगना देवी और उनके साथ काम करने वाली 5 अन्य महिलाओं की। रोज़ की तरह वे सभी एन्क्लोजर नंबर 16 के पास शांति से घास काट रही थीं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि कुछ ही पलों में मौत उनके बेहद करीब आने वाली है।
तभी वहां एक बड़ी लापरवाही होती है। गार्ड बिना किसी अलर्ट या चेतावनी के अचानक बाघ का पिंजरा खोल देता है।
पिंजरे के अंदर था खतरनाक टाइगर शिवाजी। पिंजरा खुलते ही वह आज़ाद हो जाता है और उसकी नज़र सामने काम कर रही महिलाओं पर पड़ती है। केवल 25 फीट की दूरी… और बाघ सीधा हमला बोल देता है!चीख-पुकार मच जाती है। जान बचाने की कशमकश में 5 महिलाएं अपनी फुर्ती दिखाती हैं। कोई लोहे की ऊंची जाली पर लटक जाती है, तो कोई पास के पेड़ पर चढ़ जाती है। लेकिन किस्मत सुगना देवी के साथ नहीं थी। वो भाग नहीं पाई। बाघ सुगना को दबोच लेता है और घसीटते हुए बाड़े के अंदर ले जाता है। पल भर में ही सब कुछ खत्म हो जाता है… बाघ सुगना को अपना शिकार बना लेता है और सुगना काल के गाल में समा जाती है।
इस खौफनाक मंज़र को देखकर पार्क में हड़कंप मच गया। गुस्साए परिजनों और लोगों ने पार्क के बाहर धरना दे दिया। यह प्रदर्शन पूरे साढ़े छह घंटे तक चला। आखिरकार, प्रशासन को झुकना पड़ा—पीड़ित परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता, डेयरी बूथ और परिवार के दो सदस्यों को नौकरी देने पर सहमति बनी, तब जाकर धरना समाप्त हुआ।
लेकिन दोस्तों, यह कोई पहली घटना नहीं है। अगर आंकड़ों की बात करें, तो अकेले रणथंभौर में पिछले 38 सालों में बाघों के हमलों में 22 लोगों की जान जा चुकी है। 1987 से शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा है।
यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि वन्यजीव पार्कों में सुरक्षा नियमों की इतनी बड़ी अनदेखी आख़िर कब तक चलती रहेगी? और मासूम लोग कब तक अपनी जान गंवाते रहेंगे?
