चीनी महंगी हुई तो क्या शराब भी महंगी होगी?

चीनी की कीमतों में तेजी का असर सिर्फ चाय, मिठाई और दूसरी खाद्य चीजों तक सीमित नहीं रह सकता. कुछ मादक पेय बनाने में भी चीनी या मीठे पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर चीनी महंगी होती है तो क्या शराब की बोतल भी महंगी हो जाएगी? इसका जवाब है—हर शराब पर इसका असर एक जैसा नहीं होगा। कुछ ड्रिंक्स में चीनी की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जबकि कई सामान्य स्पिरिट्स में सीधे रिफाइंड चीनी का इस्तेमाल बहुत कम या अलग तरीके से होता है.
लिक्योर में होती है ज्यादा चीनी
शराब की कई कैटेगरी में लिक्योर (Liqueur) ऐसी ड्रिंक है जिसमें मिठास महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. लिक्योर आमतौर पर स्पिरिट के साथ चीनी और अलग-अलग फ्लेवर, फल, जड़ी-बूटियों या अन्य स्वाद देने वाले पदार्थों से तैयार की जाती है.
इसी वजह से लिक्योर का स्वाद सामान्य व्हिस्की, वोदका या जिन की तुलना में ज्यादा मीठा हो सकता है. कई लिक्योर का इस्तेमाल कॉकटेल और डेजर्ट में भी किया जाता है.
हालांकि, हर लिक्योर में चीनी की मात्रा एक जैसी नहीं होती. यह उसके प्रकार और बनाने की प्रक्रिया पर निर्भर करती है.
फ्लेवर्ड ड्रिंक्स में भी बढ़ सकती है मिठास
फ्लेवर्ड स्पिरिट्स और कुछ तैयार किए गए अल्कोहलिक ड्रिंक्स में स्वाद को बेहतर बनाने के लिए चीनी या अन्य स्वीटनर्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. फ्लेवर्ड वोदका, रम या अन्य ड्रिंक्स में फलों और दूसरे फ्लेवर के साथ मिठास जोड़ी जा सकती है. इसलिए अगर उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली चीनी महंगी होती है, तो इन उत्पादों की लागत पर कुछ असर पड़ने की संभावना रहती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर फ्लेवर्ड शराब की कीमत तुरंत बढ़ जाएगी.
व्हिस्की और दूसरी स्पिरिट्स में मामला अलग है
अब बात करते हैं उन शराबों की जिन्हें आमतौर पर लोग व्हिस्की, रम, ब्रांडी या अन्य स्पिरिट्स के नाम से जानते हैं. इनमें इस्तेमाल होने वाला प्रमुख कच्चा माल उनकी कैटेगरी के अनुसार अलग होता है. भारत में कई स्पिरिट्स के उत्पादन में मोलासेस (शीरा) का इस्तेमाल किया जाता है. यह गन्ने से चीनी बनाने की प्रक्रिया से निकलने वाला एक अलग उप-उत्पाद है. इसलिए बाजार में बिकने वाली रिफाइंड चीनी की कीमत और मोलासेस की कीमत को सीधे एक जैसा मानना सही नहीं होगा.
यानी अगर रसोई में इस्तेमाल होने वाली चीनी महंगी हो रही है, तो इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि हर व्हिस्की या रम बनाने की लागत उसी अनुपात में बढ़ जाएगी.
चीनी महंगी होने पर किन ड्रिंक्स पर ज्यादा असर?
अगर चीनी की कीमत में लगातार बढ़ोतरी होती है, तो उन ड्रिंक्स पर अपेक्षाकृत ज्यादा लागत दबाव आ सकता है जिनमें सीधे चीनी या स्वीटनर का इस्तेमाल ज्यादा होता है। इसमें कुछ लिक्योर, फ्लेवर्ड अल्कोहलिक ड्रिंक्स और मीठे तैयार पेय शामिल हो सकते हैं. हालांकि किसी कंपनी के उत्पादन फॉर्मूले, इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और कॉन्ट्रैक्ट कीमतों के आधार पर असर अलग-अलग हो सकता है.
क्या इससे शराब की बोतल महंगी हो जाएगी?
यह सबसे अहम सवाल है और इसका जवाब फिलहाल सीधे हां या ना में नहीं दिया जा सकता। शराब की अंतिम कीमत सिर्फ कच्चे माल से तय नहीं होती. भारत में शराब की कीमतों पर राज्य सरकारों की एक्साइज ड्यूटी, टैक्स, लाइसेंस फीस, वितरण लागत और अन्य शुल्क का भी बड़ा प्रभाव होता है. इसलिए चीनी की कीमत बढ़ने के बावजूद किसी शराब की खुदरा कीमत तुरंत बढ़े, यह जरूरी नहीं है.
कंपनियां बढ़ी हुई लागत को कुछ समय तक खुद भी वहन कर सकती हैं. दूसरी तरफ अगर उत्पादन लागत लगातार बढ़ती है, तो कीमतों में बदलाव की संभावना बन सकती है.
हर राज्य में शराब की कीमत अलग क्यों होती है?
भारत में शराब का कारोबार काफी हद तक राज्य स्तर पर नियंत्रित होता है. यही कारण है कि एक ही ब्रांड की बोतल अलग-अलग राज्यों में अलग कीमत पर मिल सकती है.
राज्यों में टैक्स और एक्साइज व्यवस्था अलग होने के कारण शराब की कीमतों में बड़ा अंतर देखने को मिलता है. इसलिए अगर किसी शराब की कीमत बढ़ती भी है, तो उसका असर पूरे देश में एक जैसा होगा, ऐसा जरूरी नहीं है.
सिर्फ चीनी की कीमत देखकर न लगाएं अनुमान
चीनी की बढ़ती कीमत निश्चित रूप से उन उत्पादों के लिए चिंता का विषय हो सकती है जिनमें इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में होता है. लेकिन शराब की कीमत का पूरा अनुमान सिर्फ चीनी के भाव देखकर लगाना सही नहीं होगा. शराब के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले दूसरे कच्चे माल, पैकेजिंग, परिवहन, टैक्स और सरकारी नीतियां भी अंतिम कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
