प्रस्तावना

भारतीय आईटी और टेक इंडस्ट्री वैश्विक स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी है। सॉफ्टवेयर सर्विसेज, कंसल्टिंग, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। हाल ही में, इंडस्ट्री की शीर्ष संस्था नैसकॉम (NASSCOM) ने एक अहम बयान जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि भारतीय टेक कंपनियां अमेरिका में स्थानीय स्किल डेवलपमेंट और भर्ती पर 1 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश कर रही हैं।
इस घोषणा ने यह साफ कर दिया है कि भारतीय कंपनियां अब एच-1बी वीजा पर निर्भरता कम करके अमेरिका में लोकल टैलेंट हायरिंग और स्किलिंग प्रोग्राम्स पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
एच-1बी वीजा और भारतीय कंपनियों का संबंध
एच-1बी वीजा लंबे समय से भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका में काम करने का प्रमुख साधन रहा है।
- 2015 में भारतीय और भारत से जुड़ी कंपनियों को 14,792 एच-1बी वीजा मिले थे।
- 2024 तक यह संख्या घटकर 10,162 रह गई।
- आज की तारीख में टॉप 10 भारतीय कंपनियों में एच-1बी वीजा धारकों की संख्या कुल कर्मचारियों का 1% से भी कम है।
इसका मतलब साफ है कि कंपनियां अब ज्यादा से ज्यादा लोकल टैलेंट को हायर कर रही हैं।
नैसकॉम का बयान

नैसकॉम ने अपने बयान में कहा:
- भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिका में लोकल हायरिंग और अपस्किलिंग पर लगातार निवेश कर रही हैं।
- आने वाले वर्षों में यह निवेश और तेज होगा।
- एच-1बी वीजा पर बढ़ी हुई फीस का असर भारतीय टेक कंपनियों पर सीमित रहेगा क्योंकि उनकी निर्भरता अब बहुत कम हो चुकी है।
अमेरिका में निवेश क्यों ज़रूरी है?
भारतीय टेक इंडस्ट्री के लिए अमेरिका सबसे बड़ा बाजार है।
- लोकल स्किल गैप को भरना
- अमेरिकी कंपनियों को हाई-स्किल्ड टेक टैलेंट की भारी कमी है।
- भारतीय कंपनियां स्किलिंग प्रोग्राम्स के जरिए इस गैप को भरने में मदद कर रही हैं।
- बिजनेस निरंतरता बनाए रखना
- अमेरिका में ही स्थानीय लोगों को हायर करने से बिजनेस ऑपरेशंस पर किसी नए वीजा नियम का असर कम पड़ता है।
- अमेरिका-भारत संबंध मजबूत करना
- लोकल जॉब्स पैदा करने से अमेरिका में भारतीय कंपनियों की छवि बेहतर होती है।
- इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते और गहरे होते हैं।
एच-1बी फीस और उसका असर
20 सितंबर को व्हाइट हाउस ने साफ किया कि:
- नई $100,000 फीस केवल नए एच-1बी वीजा एप्लीकेशंस पर लागू होगी।
- मौजूदा वीजा धारकों पर यह नियम लागू नहीं होगा।
- यह केवल एक बार ली जाएगी, हर साल नहीं।
इससे इंडस्ट्री में बनी कई तरह की उलझन और अनिश्चितता दूर हो गई है।
भारतीय कंपनियों की रणनीति
भारतीय आईटी दिग्गज जैसे TCS, Infosys, Wipro, HCL Tech और Tech Mahindra ने पिछले कुछ सालों में अमेरिका में भारी निवेश किया है।
- हजारों अमेरिकियों को लोकल ऑफिसों में हायर किया गया।
- कई कंपनियों ने अमेरिका में इनnovation hubs और ट्रेनिंग सेंटर्स खोले।
- लोकल जॉब्स पर फोकस करने से राजनीतिक दबाव भी कम हुआ और कंपनियों को बिजनेस अवसर भी ज्यादा मिले।
स्किलिंग प्रोग्राम्स का महत्व

भारतीय कंपनियां केवल लोकल हायरिंग ही नहीं कर रहीं, बल्कि वहां के युवाओं को ट्रेनिंग और अपस्किलिंग भी कर रही हैं।
- डिजिटल टेक्नोलॉजीज जैसे AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सिक्योरिटी, डेटा एनालिटिक्स में ट्रेनिंग दी जा रही है।
- इससे अमेरिका में भविष्य के टैलेंट पूल को मजबूत किया जा रहा है।
- लोकल छात्रों को भी इंटर्नशिप और स्कॉलरशिप प्रोग्राम्स का लाभ मिल रहा है।
इनोवेशन और R&D को बढ़ावा
नैसकॉम का कहना है कि भारतीय टेक कंपनियां अमेरिका में रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर भी भारी निवेश कर रही हैं।
- इससे नए प्रोडक्ट्स और सॉल्यूशंस विकसित हो रहे हैं।
- कंपनियां अमेरिकी यूनिवर्सिटीज और स्टार्टअप्स के साथ भी मिलकर काम कर रही हैं।
- ग्लोबल इनोवेशन इकोनॉमी में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।
विशेषज्ञों की राय
इंडस्ट्री एनालिस्ट्स का कहना है:
- यह कदम भारतीय कंपनियों को अमेरिका में लॉन्ग-टर्म स्थिरता देगा।
- लोकल हायरिंग से कंपनियों की छवि सुधरेगी और ग्राहकों का भरोसा बढ़ेगा।
- एच-1बी फीस का असर सीमित रहेगा क्योंकि कंपनियां पहले से ही इस दिशा में बदलाव कर चुकी हैं।
भारत-अमेरिका साझेदारी पर असर
भारतीय आईटी कंपनियों की यह रणनीति दोनों देशों के रिश्तों के लिए भी अहम है।
- अमेरिका में लोकल जॉब्स बढ़ाने से राजनीतिक समर्थन मिलेगा।
- भारत की टेक्नोलॉजी ताकत को और ज्यादा मान्यता मिलेगी।
- दोनों देशों के बीच डिजिटल सहयोग और मजबूत होगा।
निष्कर्ष
भारतीय आईटी इंडस्ट्री अब एच-1बी वीजा पर निर्भर नहीं रहना चाहती। नैसकॉम के ताज़ा बयान ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य में कंपनियां लोकल टैलेंट हायरिंग, अपस्किलिंग और इनोवेशन पर ही फोकस करेंगी।
अमेरिका में $1 बिलियन से ज्यादा का निवेश सिर्फ टेक कंपनियों की मजबूती नहीं दिखाता, बल्कि यह भी बताता है कि भारतीय इंडस्ट्री अब ग्लोबल पावरहाउस बनने की राह पर है।
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