🔥 Mirzapur The Movie Review: भौकाल पूरा है, कहानी भी दमदार! लेकिन 3 घंटे 17 मिनट की फिल्म कुछ जगहों पर खिंचती हुई लगती है. जानिए पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु और रवि किशन की फिल्म कैसी है......

मिर्जापुर की वही पुरानी दुनिया, वही किरदार और वही दबदबा… लेकिन इस बार कहानी बड़े पर्दे के लिए नई है. फिल्म में एक्शन, इमोशन, दमदार डायलॉग्स और जबरदस्त एक्टिंग का पूरा मसाला है. लंबी अवधि कुछ जगहों पर रफ्तार को धीमा कर देती है……
मिर्जापुर की गद्दी का नाम सुनते ही दिमाग में एक ही चीज आती है—भौकाल. वेब सीरीज के जरिए दर्शकों के दिल में अपनी खास जगह बनाने वाली मिर्जापुर की दुनिया अब बड़े पर्दे पर पहुंच चुकी है. लंबे इंतजार के बाद ‘मिर्जापुर द मूवी’ सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है. सबसे बड़ा सवाल यही था कि जब दर्शक इन किरदारों को पहले ही देख चुके हैं, तो फिल्म में नया क्या मिलेगा? क्या यह सिर्फ सीरीज का विस्तार है या फिर कहानी को बिल्कुल नई दिशा दी गई है? फिल्म देखने के बाद जवाब काफी हद तक साफ है—किरदार पुराने हैं, लेकिन कहानी नई है.
कहानी में क्या है….?
मिर्जापुर की गद्दी एक बार फिर कहानी के केंद्र में है. जिस गद्दी पर कलीन भैया का दबदबा है, उस पर कई लोगों की नजर है. बहराइच, जौनपुर से लेकर जैसलमेर तक के किरदार इस सत्ता की लड़ाई में अपना हिस्सा चाहते हैं. फिल्म की खास बात यह है कि यह सीरीज की कहानी को दोहराने के बजाय उसी दुनिया के किरदारों को लेकर एक नई कहानी पेश करती है. गुड्डू भैया, मुन्ना भैया, बीना और कलीन भैया जैसे किरदारों के रिश्ते, उनकी महत्वाकांक्षाएं और उनके भीतर चल रही जंग कहानी को आगे बढ़ाती है. खासतौर पर गुड्डू और मुन्ना के किरदारों के बीच की प्रतिस्पर्धा और भावनात्मक परतें फिल्म को सिर्फ गैंगस्टर कहानी बनने से बचाती हैं. दोनों किरदारों की अपनी-अपनी इच्छाएं हैं, अपने परिवार से जुड़ी उम्मीदें हैं और सत्ता को लेकर अलग नजरिया है. यही टकराव फिल्म में दिलचस्पी बनाए रखता है.
डायरेक्शन और राइटिंग कैसी है….?
फिल्म का निर्देशन गुरमीत सिंह ने किया है. उन्होंने मिर्जापुर की पुरानी पहचान को बरकरार रखते हुए कहानी को बड़े पर्दे के हिसाब से पेश करने की कोशिश की है. वहीं कहानी और स्क्रीनप्ले में पुराने किरदारों के साथ नई परिस्थितियां जोड़ने का काम अच्छी तरह किया गया है. फिल्म में एक्शन और इमोशन के बीच संतुलन नजर आता है. लेकिन यहां फिल्म की सबसे बड़ी कमी भी सामने आती है—लंबाई. करीब 3 घंटे 17 मिनट की अवधि वाली यह फिल्म कई जगह जरूरत से ज्यादा लंबी महसूस होती है. खासकर पहला हिस्सा कुछ किरदारों और घटनाओं को स्थापित करने में ज्यादा समय लेता है. सेकंड हाफ में भी कुछ सीक्वेंस ऐसे हैं जिन्हें थोड़ा छोटा किया जाता तो फिल्म की रफ्तार और बेहतर हो सकती थी.
रवि किशन ने बढ़ाया नया रंग…..
फिल्म में रवि किशन की एंट्री कहानी में नया ट्विस्ट लेकर आती है. उनका किरदार बब्बन यादव बाकी किरदारों से काफी अलग नजर आता है. उनका अंदाज, संवाद बोलने का तरीका और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म में एक अलग रंग भरता है. खासकर उनका महिलाओं के प्रति सम्मान वाला पक्ष उनके किरदार को सामान्य गैंगस्टर कैरेक्टर से अलग बनाता है. उनका डायलॉग “जुबान ही मेरा कॉन्ट्रैक्ट है” फिल्म के उन संवादों में शामिल है जो दर्शकों को पसंद आ सकते हैं.
पंकज त्रिपाठी से लेकर अली फजल तक, एक्टिंग में दम…..
अगर मिर्जापुर की दुनिया की बात हो और कलीन भैया का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. पंकज त्रिपाठी एक बार फिर कलीन भैया के किरदार में अपना असर छोड़ते हैं. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ऐसी है कि कई दृश्यों में उनके आते ही पूरा फोकस उन्हीं पर चला जाता है. वहीं अली फजल गुड्डू भैया के किरदार में फिर उसी तेवर के साथ नजर आते हैं. दिव्येंदु का मुन्ना भैया वाला अंदाज भी दर्शकों को पुरानी मिर्जापुर की याद दिलाता है. रसिका दुग्गल की बीना का किरदार इस बार और ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आता है. उनकी बैकस्टोरी कहानी को एक भावनात्मक गहराई देती है और कुछ जगहों पर उनका प्रदर्शन कहानी का सबसे मजबूत हिस्सा बन जाता है. इसके अलावा जितेंद्र कुमार की एंट्री भी दिलचस्प है. बबलू पंडित के किरदार में वह कहानी में अपनी अलग छाप छोड़ते हैं. सोनल चौहान भी फिल्म में नया एंगल लेकर आती हैं और उनका ट्रैक कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करता है.
डायलॉग्स में फिर वही मिर्जापुर वाला स्वाद…..
मिर्जापुर की पहचान सिर्फ उसके किरदारों या हिंसा से नहीं, बल्कि उसके दमदार डायलॉग्स से भी रही है. फिल्म इस मामले में भी दर्शकों को निराश नहीं करती. कई ऐसे संवाद हैं जो थिएटर में तालियां और सीटियां बटोरने का दम रखते हैं. संवादों में सत्ता, प्यार, वफादारी और रिश्तों की लड़ाई को अच्छी तरह पिरोया गया है. यानी अगर आपको मिर्जापुर सीरीज के तीखे और देसी डायलॉग्स पसंद रहे हैं, तो फिल्म में भी आपको वही स्वाद मिलने वाला है.
क्लाइमेक्स है सबसे बड़ा सरप्राइज….
फिल्म का क्लाइमेक्स इसकी सबसे बड़ी ताकत में से एक है. कहानी जिस दिशा में जाती हुई नजर आती है, अंत में वहां से एक अलग मोड़ सामने आता है. मेकर्स ने यहां सिर्फ गैंगवार और सत्ता की लड़ाई पर निर्भर रहने के बजाय इमोशनल एंगल को भी मजबूत किया है. यही वजह है कि क्लाइमेक्स फिल्म को एक अलग प्रभाव देता है. बिना स्पॉइलर दिए इतना जरूर कहा जा सकता है कि अंत तक पहुंचते-पहुंचते कहानी कई सवालों के जवाब देने के साथ कुछ नए सवाल भी छोड़ जाती है.
Verdict: देखनी चाहिए या नहीं….?
‘मिर्जापुर द मूवी’ उन दर्शकों के लिए बनाई गई है जिन्हें मिर्जापुर की दुनिया पसंद है. फिल्म में पुराने पसंदीदा किरदार हैं, नई कहानी है, भरपूर एक्शन है, दमदार डायलॉग्स हैं और इमोशन भी है. कमजोरी सिर्फ इसकी लंबाई है. 3 घंटे 17 मिनट का रनटाइम कुछ दर्शकों के लिए भारी पड़ सकता है और कुछ हिस्सों में फिल्म को और ज्यादा टाइट किया जा सकता था. इसके बावजूद फिल्म अपने किरदारों और क्लाइमेक्स के दम पर असर छोड़ने में कामयाब रहती है. अगर आपको कलीन भैया, गुड्डू भैया और मुन्ना भैया की दुनिया पसंद है, तो ‘मिर्जापुर द मूवी’ थिएटर में देखने लायक है. क्योंकि मिर्जापुर की गद्दी की लड़ाई इस बार छोटे पर्दे से निकलकर बड़े पर्दे पर पहुंच चुकी है—और भौकाल अभी भी बरकरार है…..
