वही ब्रांड, वही पैकेट, लेकिन भारत में रेसिपी अलग क्यों? जानिए फैंटा, किटकैट और मैगी जैसे प्रोडक्ट्स को लेकर उठे सवाल और ग्राहकों को क्या देखना चाहिए।

कई ग्लोबल कंपनियां अलग-अलग देशों के लिए अपने प्रोडक्ट की रेसिपी और पैकेजिंग में बदलाव करती हैं. चीनी, नमक, तेल और लेबलिंग को लेकर भारत में लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. आखिर इसकी वजह क्या है और ग्राहकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए…..
एक ही ब्रांड, एक जैसा दिखने वाला पैकेट और नाम भी वही, लेकिन अलग-अलग देशों में मिलने वाले प्रोडक्ट की सामग्री में अंतर हो सकता है. यही वजह है कि ग्लोबल फूड कंपनियों के भारतीय बाजार में बेचे जाने वाले प्रोडक्ट्स को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. आरोप यह है कि कुछ प्रोडक्ट्स के भारतीय वर्जन में चीनी, नमक या सस्ते वनस्पति तेल की मात्रा अधिक हो सकती है, जबकि दूसरे देशों में उसी ब्रांड के प्रोडक्ट में अलग सामग्री या फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी दी जाती है. कंपनियों का तर्क है कि अलग देशों के स्वाद, नियम, कीमत और उपभोक्ता पसंद के हिसाब से रेसिपी में बदलाव किया जाता है….
एक ही ब्रांड की रेसिपी अलग क्यों….?
ग्लोबल कंपनियां हर देश में बिल्कुल एक जैसी रेसिपी इस्तेमाल नहीं करतीं. स्थानीय नियम, कच्चे माल की उपलब्धता, कीमत, लोगों की पसंद और बाजार की मांग के आधार पर प्रोडक्ट में बदलाव किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, किसी देश में कम चीनी वाली ड्रिंक की मांग ज्यादा हो सकती है, जबकि दूसरे बाजार में ज्यादा मीठा स्वाद पसंद किया जाता है. इसी तरह इस्तेमाल होने वाले तेल या अन्य सामग्री में भी अंतर हो सकता है. लेकिन विवाद तब बढ़ता है जब उपभोक्ताओं को इन अंतर के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती.
फैंटा को लेकर क्यों उठे सवाल….?
रिपोर्ट में भारत और ब्रिटेन में बिकने वाली फैंटा की तुलना का उदाहरण दिया गया है. दावा है कि दोनों बाजारों में एक ही ब्रांड की ड्रिंक होने के बावजूद चीनी की मात्रा में बड़ा अंतर है. यूरोप में कुछ खाद्य और पेय उत्पादों पर खास सामग्री या पोषण संबंधी चेतावनी को पैकेज के सामने दिखाना जरूरी हो सकता है. वहीं भारत में पोषण संबंधी जानकारी मुख्य रूप से पैकेट के पीछे दी जाती है. यही वजह है कि सवाल उठता है कि अगर किसी प्रोडक्ट में चीनी या अन्य पोषक तत्वों की मात्रा अधिक है तो ग्राहक को इसे खरीदने से पहले आसानी से जानकारी क्यों नहीं मिलनी चाहिए?
किटकैट में कोको को लेकर भी अंतर….
चॉकलेट को लेकर भी अलग-अलग देशों के प्रोडक्ट्स की तुलना की जाती रही है. रिपोर्ट में भारत और ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले किटकैट के उदाहरण का उल्लेख है, जहां कोको सॉलिड की मात्रा में अंतर बताया गया है. चॉकलेट की रेसिपी में कोको, दूध के घटक, चीनी और वनस्पति फैट जैसे कई तत्व शामिल हो सकते हैं. अलग बाजारों में इनकी मात्रा अलग होना जरूरी नहीं कि किसी एक प्रोडक्ट को अपने आप असुरक्षित साबित करे, लेकिन इससे उपभोक्ताओं के बीच गुणवत्ता को लेकर सवाल जरूर उठते हैं.
मैगी की पैकेजिंग ने बढ़ाई बहस….
मैगी को लेकर भी भारत और ब्रिटेन के पैकेट की तुलना चर्चा में रही है. रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन में बिकने वाले कुछ वेरिएंट में सनफ्लावर ऑयल का इस्तेमाल होता है, जबकि भारत में बिकने वाले वेरिएंट में पाम ऑयल का इस्तेमाल बताया गया है. इसके अलावा ब्रिटेन में फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग के जरिए नमक, चीनी और फैट जैसी चीजों की मात्रा को आसानी से समझने का विकल्प मिलता है. भारत में ऐसी फ्रंट चेतावनी व्यवस्था को लेकर अभी भी बहस जारी है.
बच्चों के खाने को लेकर भी सवाल….
बेबी फूड सेगमेंट में भी चीनी की मात्रा को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है. रिपोर्ट में नेस्ले के सेरेलैक का उदाहरण दिया गया है और बताया गया है कि कंपनी ने भारत में बिना अतिरिक्त चीनी वाला विकल्प पेश करने की दिशा में बदलाव किया. यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों के शुरुआती आहार में अतिरिक्त चीनी को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ और उपभोक्ता संगठन लंबे समय से सावधानी बरतने की सलाह देते रहे हैं.
कंपनियों का क्या तर्क है….?
फूड कंपनियों की ओर से आमतौर पर कहा जाता है कि हर देश का बाजार अलग होता है. लोगों की स्वाद पसंद, स्थानीय नियम, कच्चे माल की कीमत और उत्पाद की कीमत को ध्यान में रखते हुए रेसिपी तैयार की जाती है. यानी किसी प्रोडक्ट की रेसिपी में बदलाव का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि कंपनी जानबूझकर किसी देश के ग्राहकों को घटिया सामान दे रही है.उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े लोगों की चिंता यह है कि अगर सामग्री में बड़ा अंतर है तो पैकेजिंग पर इसकी जानकारी भी उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए.
भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर बहस….
भारत में पैकेट के सामने स्पष्ट पोषण चेतावनी लगाने को लेकर कई वर्षों से चर्चा चल रही है. इसका उद्देश्य यह बताया जाना है कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या फैट की मात्रा कितनी है, ताकि ग्राहक खरीदारी के समय बेहतर फैसला ले सके. फिलहाल भारतीय उपभोक्ताओं को किसी प्रोडक्ट की विस्तृत पोषण जानकारी के लिए पैकेट के पीछे दिए गए लेबल को पढ़ना पड़ता है….
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला….
फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी और जंक फूड की लेबलिंग को लेकर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हुई है. इस बहस का मुख्य उद्देश्य यह है कि उपभोक्ताओं को किसी प्रोडक्ट की पोषण संबंधी जानकारी आसानी से और स्पष्ट रूप से मिल सके. अगर भविष्य में फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी व्यवस्था लागू होती है तो ग्राहकों के लिए ज्यादा चीनी, नमक या फैट वाले उत्पादों की पहचान करना आसान हो सकता है.
ग्राहकों को क्या करना चाहिए….?
जब तक पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी की व्यवस्था नहीं होती, तब तक ग्राहकों को खुद लेबल पढ़ने की आदत डालनी चाहिए.
खरीदारी करते समय इन चीजों पर खास ध्यान दें:-
- चीनी की मात्रा: प्रति 100 ग्राम या 100 मिलीलीटर कितनी चीनी है।
- नमक: सोडियम की मात्रा जरूर देखें।
- तेल: किस तरह का तेल या फैट इस्तेमाल किया गया है।
- Ingredients List: सामग्री की सूची में शुरुआत में लिखी चीजों की मात्रा आमतौर पर ज्यादा होती है।
- Serving Size: सिर्फ एक सर्विंग की जानकारी देखकर भ्रमित न हों।
- Nutrition Table: कैलोरी, फैट, शुगर और सोडियम की तुलना करें।
आखिर सवाल सिर्फ क्वालिटी का नहीं, पारदर्शिता का है….
अलग देशों में एक ही ब्रांड के प्रोडक्ट की रेसिपी अलग होना अपने आप में असामान्य नहीं है. असली सवाल यह है कि ग्राहक को इसकी जानकारी कितनी स्पष्टता से दी जा रही है. अगर किसी प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट की मात्रा ज्यादा है तो ग्राहक को पैकेट देखकर आसानी से यह समझ आना चाहिए. इससे वह अपनी जरूरत और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए फैसला ले सकेगा….
