प्याज सिर्फ रसोई नहीं, सियासत भी बदलता है!

भारत में प्याज सिर्फ रसोई की एक आम सब्जी नहीं है. इसकी कीमत में अचानक होने वाली बढ़ोतरी कई बार सीधे राजनीति को प्रभावित करती रही है. प्याज की महंगाई ने चुनावों में सरकारों के खिलाफ माहौल बनाया और राजनीतिक दलों को इसे बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल करने का मौका दिया.
भारत में प्याज की कीमत और राजनीति का रिश्ता कई दशकों पुराना है. 1980, 1998, 2010 और 2013 जैसे दौर इस बात के उदाहरण हैं कि कैसे प्याज की बढ़ती कीमतों ने जनता के बीच नाराजगी पैदा की और चुनावी समीकरणों पर असर डाला.
आइए जानते हैं कि कब-कब प्याज की महंगाई ने देश की राजनीति को प्रभावित किया.
1980: प्याज की माला बनी चुनावी हथियार
प्याज की कीमत और चुनावी राजनीति का सबसे चर्चित उदाहरण 1980 का माना जाता है.
1975 में आपातकाल लागू होने के बाद 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा. जनता पार्टी सत्ता में आई. लेकिन सरकार के भीतर राजनीतिक मतभेद और आर्थिक चुनौतियां लगातार बनी रहीं. इसी दौरान प्याज की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई. उस समय प्याज के दाम आम लोगों के लिए बड़ा मुद्दा बन गए थे.
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस नाराजगी को राजनीतिक मुद्दा बनाया. चुनावी सभाओं में प्याज की कीमतों को लेकर जनता के बीच सरकार पर निशाना साधा गया और प्याज की माला पहनकर भी विरोध दर्ज कराया गया.
1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जोरदार वापसी की और 353 सीटों पर जीत दर्ज की. प्याज की महंगाई उस चुनाव के कई मुद्दों में से एक थी, जिसने जनता के असंतोष को राजनीतिक रूप देने में भूमिका निभाई.
1998: दिल्ली में प्याज ने बदल दिया चुनावी माहौल
1998 में प्याज की कीमतों ने एक बार फिर राजनीति को प्रभावित किया. दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले प्याज की कीमतें काफी बढ़ गई थीं. रिपोर्टों के मुताबिक कई जगहों पर इसके दाम 50 से 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए थे.
बढ़ती महंगाई को लेकर तत्कालीन दिल्ली सरकार और भाजपा के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई. चुनाव से कुछ समय पहले दिल्ली में नेतृत्व परिवर्तन करते हुए सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन प्याज की महंगाई विपक्ष के लिए बड़ा चुनावी हथियार बन चुकी थी. चुनाव परिणाम में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी और शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने दिल्ली में सरकार बनाई. इसके बाद दिल्ली की राजनीति में प्याज की कीमतों को लेकर कई वर्षों तक चर्चा होती रही.
राजस्थान में भी दिखा प्याज का असर
1998 में सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भी प्याज की कीमतों को लेकर भाजपा को राजनीतिक नुकसान का सामना करना पड़ा. उस समय भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री थे. बढ़ती कीमतों और महंगाई को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरा. चुनाव परिणाम में कांग्रेस ने सत्ता हासिल की और भाजपा को सरकार से बाहर होना पड़ा. इस चुनाव में भी प्याज की महंगाई को महत्वपूर्ण मुद्दों में गिना गया.
महाराष्ट्र में मिठाई के डिब्बे में भेजा गया प्याज
1998 में महाराष्ट्र में भी प्याज की कमी और बढ़ती कीमतों को लेकर राजनीतिक विरोध देखने को मिला. कांग्रेस नेता छगन भुजबल ने विरोध के एक अनोखे तरीके के तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को मिठाई के डिब्बे में प्याज भेजा था. यह विरोध प्रदर्शन काफी चर्चा में रहा. इसके बाद राज्य सरकार की ओर से रियायती दर पर प्याज उपलब्ध कराने जैसे कदम उठाए गए. यह घटना बताती है कि उस दौर में प्याज की कीमत सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं थी, बल्कि विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का प्रभावी राजनीतिक हथियार भी बन चुकी थी.
2010: बारिश ने बढ़ाई प्याज की कीमत
2010 में प्याज की कीमत बढ़ने की एक बड़ी वजह मौसम से जुड़ी थी. महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख प्याज उत्पादक क्षेत्रों में भारी बारिश से फसल प्रभावित हुई.
आपूर्ति में कमी का असर बाजार पर दिखाई दिया और दिसंबर 2010 में कई शहरों में प्याज के दाम तेजी से बढ़े. दिल्ली में कीमतों में कुछ ही समय में बड़ा उछाल देखने को मिला.
बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने कई कदम उठाए. प्याज के निर्यात पर रोक, आयात शुल्क में कमी और विदेश से प्याज मंगाने जैसे उपाय किए गए.
सरकार के सामने चुनौती सिर्फ महंगाई नियंत्रित करने की नहीं थी, बल्कि जनता के बीच बढ़ती नाराजगी को कम करने की भी थी.
2013: प्याज ने शीला दीक्षित सरकार को दिया बड़ा झटका
प्याज और दिल्ली की राजनीति का सबसे बड़ा कनेक्शन 2013 में देखने को मिला.
दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले प्याज की कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई. उस समय दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित लगातार बढ़ती महंगाई के कारण विपक्ष के निशाने पर थीं.
कांग्रेस दिल्ली में करीब 15 वर्षों से सत्ता में थी, लेकिन महंगाई और भ्रष्टाचार समेत कई मुद्दों पर सरकार के खिलाफ माहौल बन रहा था. प्याज की बढ़ती कीमतों ने इस नाराजगी को और बढ़ाया.
2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ. भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि आम आदमी पार्टी ने भी पहली बार बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरकर दिल्ली की राजनीति को बदल दिया.
कांग्रेस की 15 साल पुरानी सरकार सत्ता से बाहर हो गई.
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि सिर्फ प्याज की कीमतों ने सरकार गिराई, क्योंकि चुनाव में कई दूसरे राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे भी मौजूद थे. लेकिन प्याज महंगाई के खिलाफ जनता की नाराजगी का एक प्रमुख प्रतीक जरूर बन गया था.
प्याज इतना बड़ा राजनीतिक मुद्दा क्यों बन जाता है?
प्याज की कीमतों का राजनीतिक असर समझने के लिए इसकी भारतीय खाने में भूमिका को समझना जरूरी है. देश के कई हिस्सों में प्याज का इस्तेमाल रोजाना की सब्जियों, दाल, ग्रेवी, सलाद और कई अन्य व्यंजनों में होता है. इसलिए इसकी कीमत बढ़ने का असर सीधे घरेलू बजट पर महसूस होता है. दूसरी वजह यह है कि प्याज की कीमतों में अचानक बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. उत्पादन में कमी, खराब मौसम, भंडारण की समस्या, परिवहन लागत और मांग-आपूर्ति में बदलाव से इसके दाम तेजी से बदल सकते हैं.
जब किसी रोजमर्रा की चीज की कीमत अचानक बढ़ती है, तो उसका असर लोगों के घरेलू बजट पर तुरंत दिखाई देता है.
प्याज किसानों के लिए भी दोधारी तलवार
प्याज की महंगाई का एक दूसरा पहलू भी है. जब बाजार में कीमतें बहुत बढ़ती हैं तो उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ता है, लेकिन जब कीमतें बहुत गिरती हैं तो किसानों को नुकसान हो सकता है.
इसलिए सरकारों के सामने प्याज को लेकर दोहरी चुनौती रहती है.
एक तरफ उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर प्याज उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना भी महत्वपूर्ण है. इसी वजह से प्याज के निर्यात, आयात, बफर स्टॉक और बाजार में सरकारी हस्तक्षेप जैसे फैसले अक्सर राजनीतिक और आर्थिक दोनों नजरिए से महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
क्या प्याज ने सच में सरकारें गिराईं?
यह कहना थोड़ा सरल होगा कि ‘प्याज ने सरकार गिरा दी’. किसी भी चुनाव का परिणाम कई मुद्दों, नेताओं की लोकप्रियता, संगठन, स्थानीय परिस्थितियों, आर्थिक स्थिति और जनता के दूसरे सवालों पर निर्भर करता है. लेकिन इतिहास में कई ऐसे मौके जरूर आए जब प्याज की कीमतें सरकार विरोधी जनभावना का प्रतीक बनीं और विपक्ष ने इसे प्रभावी चुनावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया. 1980 से लेकर 1998 और फिर 2013 तक प्याज बार-बार भारतीय राजनीति के केंद्र में आया.
