ग्वालियर में बारिश बनी आफत! सड़क और नाले का फर्क मिटा तो गहरे नाले में जा गिरा ई-रिक्शा

सड़क और नाले का फर्क मिट जाए, तो समझ लीजिए कि आप किसी शहर की बेकार सड़क पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक दावों के हवा हवाई बादलों पर चल रहे हैं। हमारे ग्वालियर से एक ऐसी ही हैरान कर देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने नगर निगम की गहरी नींद और आम आदमी की बेबसी को एक साथ उजागर कर दिया है।
किस्सा है कृष्णा कॉलोनी के मेवाती मोहल्ले का। यहाँ एक खुला नाला पिछले तीन महीनों से मौत का कुआं बना हुआ था। तीन महीने पहले नगर निगम के नुमाइंदे बड़े तामझाम के साथ आए, सफाई के नाम पर नाले का ऊपरी हिस्सा तोड़ा और… बस, उसके बाद अपनी जिम्मेदारी को वहीं खुला छोड़कर चले गए! उन्हें शायद इस बात का इल्म नहीं था कि उनकी यह अधूरी छोड़ी गई लिखावट, किसी दिन किसी की जिंदगी की सबसे बड़ी दुर्घटना लिख सकती है।
फिर आया रविवार का वो दिन। आसमान से बारिश की बूंदें गिर रही थीं, सड़कें पानी से लबालब थीं। सड़क कहाँ खत्म हुई और नाला कहाँ से शुरू हुआ, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन था। इसी बीच, मुर्गियों से भरा एक ई-रिक्शा वहाँ से गुजर रहा था। चालक ने जैसे ही रिक्शे को मोड़ने की कोशिश की, पलक झपकते ही पूरा का पूरा ई-रिक्शा उस गहरे, उफनते नाले में समा गया!
चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। चालक की किस्मत अच्छी थी कि वह इस हादसे में बाल-बाल बच गया। स्थानीय लोग तुरंत देवदूत बनकर आगे आए, उन्होंने भारी मशक्कत के बाद चालक और ई-रिक्शा को सुरक्षित बाहर निकाला। लेकिन अफसोस! उस नाले के गंदे पानी ने चालक की कमाई पर पानी फेर दिया। रिक्शे में रखी करीब 20 हजार रुपये मूल्य की मुर्गियां नाले के तेज बहाव में बह गईं।
स्थानीय नागरिक गजेंद्र और मोहल्ले के अन्य लोगों का कहना है कि उन्होंने पार्षद से लेकर नगर निगम के आला अधिकारियों के चक्कर काटे, फोन मिलाए, लेकिन प्रशासनिक कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारे शहरों में किसी हादसे को रोकने के लिए किसी की जान जाने का इंतजार किया जाता है? क्या कागज पर पूरी होने वाली विकास योजनाएं जमीन पर आकर यूं ही खुली छोड़ दी जाएंगी? ग्वालियर की इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि जब तक जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी का ढक्कन बंद नहीं करेंगे, तब तक आम जनता यूं ही हादसों के दलदल में समाती रहेगी।
