ब्रह्मपुत्र पर चीन की बढ़ती पनबिजली परियोजनाओं को लेकर भारत की चिंता क्यों बढ़ रही है?

हिमालय से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी भारत के लिए सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की अर्थव्यवस्था, खेती और पर्यावरण का महत्वपूर्ण आधार है. यही वजह है कि जब चीन तिब्बत में इसी नदी पर बड़े पैमाने पर पनबिजली परियोजनाएं विकसित करता है, तो भारत की नजर इस पूरे घटनाक्रम पर रहती है.
चीन में ब्रह्मपुत्र को यारलुंग त्संगपो (Yarlung Tsangpo) कहा जाता है. नदी तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश में भारत में प्रवेश करती है और फिर असम से होकर आगे बढ़ती है. ऐसे में नदी के ऊपरी हिस्से में होने वाली किसी भी बड़ी परियोजना का असर निचले हिस्से के देशों के लिए रणनीतिक और पर्यावरणीय चिंता का विषय बन सकता है.
चीन ने अब तक कितने बांध बनाए हैं?
इस सवाल का जवाब देते समय एक बात समझना जरूरी है कि ब्रह्मपुत्र बेसिन में चीन की सभी परियोजनाएं एक ही तरह की नहीं हैं. कुछ मुख्य धारा पर हैं, कुछ सहायक नदियों पर और कुछ अभी निर्माण या योजना के चरण में हैं.
उपलब्ध परियोजना सूचियों के मुताबिक यारलुंग त्संगपो की मुख्य धारा पर जांगमु (Zangmu) परियोजना 2015 में पूरी तरह चालू हुई. इसके बाद जियाचा/ग्याका (Jiacha/Gyaca) परियोजना भी चालू हुई. इसके अलावा डागु और जिएक्सू जैसी परियोजनाओं पर निर्माण/विकास हुआ है. अलग-अलग स्रोत परियोजनाओं की स्थिति और नामकरण को अलग तरीके से दर्ज करते हैं. भारत सरकार ने भी पहले स्पष्ट किया था कि जांगमु के साथ यारलुंग त्संगपो की मुख्य धारा पर तीन और रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी. सरकार के मुताबिक उस समय इन परियोजनाओं से पूर्वोत्तर भारत में पानी के बहाव में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं थी.
यानी यह कहना सही नहीं होगा कि चीन ने ब्रह्मपुत्र पर सिर्फ एक या दो बांध बनाए हैं. वहीं, यह भी जरूरी है कि हर परियोजना को एक विशाल जलाशय वाले बांध के रूप में न देखा जाए.
जांगमु से लेकर जियाचा तक कई परियोजनाएं
चीन ने यारलुंग त्संगपो के मध्य हिस्से में पनबिजली क्षमता विकसित करने पर काफी जोर दिया है. जांगमु हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट इनमें सबसे चर्चित परियोजनाओं में से एक है. यह 2015 में पूरी तरह चालू हुआ था. इसकी स्थापित क्षमता करीब 510 मेगावाट बताई जाती है. इसके बाद जियाचा हाइड्रोपावर स्टेशन भी विकसित किया गया. उपलब्ध परियोजना सूचियों में इसकी क्षमता करीब 360 मेगावाट दर्ज है. वहीं डागु और जिएक्सू जैसी परियोजनाएं भी इसी नदी प्रणाली पर विकसित की जा रही हैं.
इससे साफ है कि चीन का फोकस केवल एक बांध बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यारलुंग त्संगपो की जलविद्युत क्षमता का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की योजना है.
सबसे बड़ी चिंता है मेडोग का मेगा प्रोजेक्ट
भारत की चिंता सिर्फ पहले से मौजूद परियोजनाओं को लेकर नहीं है. सबसे ज्यादा चर्चा उस विशाल परियोजना को लेकर है जिसे चीन ने यारलुंग त्संगपो के निचले हिस्से में विकसित करने की योजना बनाई है.
इस परियोजना को मेडोग (Medog) क्षेत्र से जोड़ा जाता है. इसकी प्रस्तावित क्षमता करीब 60,000 मेगावाट बताई जाती है, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल कर सकती है. उपलब्ध स्रोतों में इसे अभी निर्माणाधीन/विकास के चरण में बताया गया है.
इस परियोजना की लोकेशन भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यारलुंग त्संगपो इसी क्षेत्र के बाद अरुणाचल प्रदेश की ओर बढ़ती है.
यानी भारत में नदी के प्रवेश से ठीक पहले इतनी बड़ी परियोजना विकसित होने की खबर स्वाभाविक रूप से रणनीतिक चिंता पैदा करती है.
क्या चीन ब्रह्मपुत्र का पानी रोक सकता है?
यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता है, लेकिन इसका जवाब सीधा ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना सही नहीं होगा.
बांध और जलविद्युत परियोजनाएं नदी के प्रवाह के समय और मात्रा को कुछ हद तक प्रभावित कर सकती हैं, खासकर यदि उनमें बड़े जलाशय हों. लेकिन रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाओं का संचालन बड़े स्टोरेज बांधों से अलग होता है.
भारत सरकार ने भी पहले यारलुंग त्संगपो की चार परियोजनाओं को रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं बताते हुए कहा था कि उनसे पूर्वोत्तर भारत के पानी के बहाव में महत्वपूर्ण बदलाव की उम्मीद नहीं थी.
हालांकि भविष्य में बड़े पैमाने की परियोजनाओं के बढ़ने से नदी के प्राकृतिक प्रवाह, मौसमी पैटर्न और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंता बनी रहती है.
क्या इससे भारत में ‘वॉटर बॉम्ब’ जैसा खतरा है?
सोशल मीडिया और कुछ चर्चाओं में बड़े बांधों को ‘वॉटर बॉम्ब’ तक कहा जाता है. लेकिन इस शब्द को सावधानी से समझना जरूरी है. किसी बांध के अचानक टूटने की स्थिति में नीचे की ओर बड़े पैमाने पर पानी पहुंच सकता है. मगर ऐसी स्थिति को सामान्य या संभावित घटना मान लेना सही नहीं होगा. जोखिम कई चीजों पर निर्भर करता है—बांध का डिजाइन, जलाशय में पानी की मात्रा, भूकंप, भूस्खलन, बांध की संरचनात्मक स्थिति और उस समय नदी का बहाव.
मेडोग और आसपास का हिमालयी क्षेत्र भूकंपीय और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील माना जाता है. इसलिए इतनी बड़ी परियोजना के निर्माण में सुरक्षा और आपदा प्रबंधन महत्वपूर्ण मुद्दे हैं.
मानसून में बढ़ सकती है चिंता
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय मानसून का होता है. ब्रह्मपुत्र पहले से ही भारी बारिश और हिमालयी जलप्रवाह के कारण काफी ज्यादा पानी लेकर आती है. ऐसे में ऊपर की ओर किसी परियोजना से पानी के प्रवाह में बदलाव और प्राकृतिक बाढ़ की स्थिति एक साथ आती है तो निचले इलाकों में जोखिम बढ़ सकता है. दूसरी तरफ, सूखे या कम बारिश वाले समय में पानी के प्रवाह में कमी भी चिंता का कारण बन सकती है.
हालांकि किसी खास बांध से भारत में निश्चित रूप से कितनी बाढ़ आएगी या कितना पानी कम होगा, इसका अनुमान बिना विस्तृत हाइड्रोलॉजिकल डेटा के लगाना सही नहीं होगा.
गाद यानी Sediment पर भी पड़ेगा असर
ब्रह्मपुत्र अपने साथ बड़ी मात्रा में गाद यानी sediment लेकर आती है. हिमालयी इलाकों से आने वाली यह गाद नदी के प्राकृतिक स्वरूप और निचले इलाकों की मिट्टी पर असर डालती है. बड़े बांध जलाशय में गाद को रोक सकते हैं. इससे नीचे की ओर पहुंचने वाले sediment की मात्रा और नदी की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.
भारत में हालिया शोध ने भी दिखाया है कि ब्रह्मपुत्र बेसिन में भूस्खलन और sediment movement नदी के स्वरूप और बाढ़ के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं. एक सरकारी शोध-सार के मुताबिक पूर्वी हिमालय से आने वाले महीन कण 1,000 किलोमीटर से अधिक दूर तक जा सकते हैं, जबकि मोटे sediment नदी के स्वरूप को अपेक्षाकृत नजदीकी हिस्सों में प्रभावित करते हैं. इसलिए बांधों का असर केवल पानी की मात्रा तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए.
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या है?
भारत की चिंता को मोटे तौर पर चार हिस्सों में समझा जा सकता है:
1. पानी के प्रवाह पर असर: बड़े जलाशयों वाली परियोजनाएं नदी के मौसमी प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं.
2. बाढ़ का जोखिम: अचानक पानी छोड़े जाने या किसी आपदा की स्थिति में निचले इलाकों पर असर पड़ सकता है.
3. पर्यावरणीय बदलाव: नदी का प्राकृतिक प्रवाह और sediment movement बदलने से जलीय पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है.
4. रणनीतिक चिंता: ब्रह्मपुत्र भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण नदी है. इसलिए इसके ऊपरी हिस्से में चीन की बड़ी परियोजनाएं सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि रणनीतिक महत्व का भी विषय हैं.
भारत और चीन के बीच नदी को लेकर क्या व्यवस्था है?
ब्रह्मपुत्र जैसे सीमा पार बहने वाले नदी तंत्र को लेकर भारत और चीन के बीच बातचीत का एक तंत्र मौजूद है. भारत सरकार ने 2006 में दोनों देशों के बीच Expert Level Mechanism स्थापित होने और बाद में बाढ़ के मौसम में हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने तथा आपातकालीन प्रबंधन पर सहयोग का उल्लेख किया है. भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि ऊपरी हिस्से में होने वाली गतिविधियों से निचले इलाकों के हित प्रभावित नहीं होने चाहिए.
चीन क्या कहता है?
चीन का पक्ष यह रहा है कि उसकी यारलुंग त्संगपो परियोजनाएं मुख्य रूप से स्वच्छ ऊर्जा और आर्थिक विकास के लिए हैं और उनसे भारत को नुकसान नहीं होगा. चीनी पक्ष ने विशेष रूप से यह तर्क दिया है कि परियोजनाओं से नदी के प्राकृतिक प्रवाह और निचले देशों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. यानी एक तरफ चीन इन परियोजनाओं को ऊर्जा और विकास की जरूरत के तौर पर देखता है, वहीं भारत इनके संभावित जल, पर्यावरण और रणनीतिक प्रभावों पर नजर रखता है.
यानी ब्रह्मपुत्र की कहानी सिर्फ पानी की नहीं है—यह पर्यावरण, ऊर्जा, भूगोल और भारत-चीन संबंधों से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है.
