ईरान पर अमेरिका की सख्ती का असर अब भारत के बासमती चावल कारोबार पर भी पड़ सकता है। निर्यात में रुकावट आई तो किसानों और एक्सपोर्टर्स के साथ घरेलू बाजार की कीमतों पर भी असर देखने को मिल सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत के बासमती चावल कारोबार पर भी पड़ सकता है। ईरान भारतीय बासमती का एक बड़ा खरीदार है और नए अमेरिकी प्रतिबंधों से निर्यातकों के सामने व्यापार और भुगतान से जुड़ी मुश्किलें बढ़ने की आशंका है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिशों का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि भारत जैसे कारोबारी साझेदारों पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर भारतीय बासमती चावल के निर्यात को लेकर चिंता बढ़ी है। ईरान भारतीय बासमती चावल के प्रमुख विदेशी बाजारों में शामिल है। ऐसे में अगर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान के साथ व्यापार में मुश्किलें बढ़ती हैं, तो भारतीय चावल निर्यातकों को भी इसका सामना करना पड़ सकता है।
ईरान भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है….?
ईरान भारतीय बासमती चावल का एक बड़ा खरीदार है। भारत के कुल बासमती निर्यात में ईरान की हिस्सेदारी करीब 18-20 फीसदी बताई जा रही है। ऐसे में ईरान के साथ व्यापार प्रभावित होने पर भारतीय निर्यातकों और चावल कारोबार से जुड़े किसानों पर इसका असर पड़ सकता है। 2026 के शुरुआती छह महीनों में भारत ने ईरान को करीब 383.11 मिलियन डॉलर का चावल निर्यात किया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोनों देशों के बीच चावल का कारोबार कितना महत्वपूर्ण है।
दुबई के रास्ते भी बढ़ी परेशानी…..
भारत से ईरान जाने वाले बासमती चावल की सप्लाई में संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE का अहम रोल रहा है। बड़ी मात्रा में चावल दुबई के बंदरगाहों के जरिए ईरान तक पहुंचता था। लेकिन ईरान के साथ व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन पर बढ़ते प्रतिबंधों के बीच यह रास्ता भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे में भारतीय निर्यातकों को नए रूट तलाशने पड़ रहे हैं।
करीब एक लाख टन चावल फंसने की चिंता…..
पश्चिम एशिया में तनाव और प्रतिबंधों की आशंका के बीच गुजरात के कांडला और मुंद्रा बंदरगाहों पर ईरान जाने वाली बड़ी मात्रा में बासमती खेप अटकने की खबर है। बताया गया है कि करीब 1 लाख टन बासमती चावल इस स्थिति से प्रभावित हो सकता है। निर्यातकों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती माल को सुरक्षित तरीके से ईरान तक पहुंचाने और भुगतान की व्यवस्था बनाए रखने की है।
तुर्की जैसे वैकल्पिक रास्तों की तलाश…..
दुबई के रास्ते व्यापार में परेशानी आने के बाद भारतीय निर्यातक दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। इनमें तुर्की जैसे वैकल्पिक मार्गों पर विचार किया जा रहा है। नए रास्तों का इस्तेमाल करने से माल पहुंचने में अधिक समय लग सकता है और शिपिंग लागत भी बढ़ सकती है। इसका सीधा असर निर्यातकों के मुनाफे और चावल की कीमत पर पड़ सकता है।
अगर निर्यात घटा तो घरेलू बाजार पर क्या असर होगा….?
ईरान को बासमती का निर्यात कम होने की स्थिति में इसका एक अलग असर भारतीय बाजार में देखने को मिल सकता है। अगर विदेश भेजे जाने वाला चावल देश में ही रह जाता है, तो घरेलू बाजार में बासमती की सप्लाई बढ़ सकती है। सप्लाई बढ़ने और मांग के मुकाबले माल अधिक उपलब्ध होने पर बासमती चावल की कीमतों में नरमी आ सकती है। यानी निर्यातकों को नुकसान होने की स्थिति में घरेलू उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत सस्ता बासमती चावल मिलने की संभावना बन सकती है।
भारत के लिए संतुलन बनाना चुनौती….
ईरान के साथ व्यापार भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक संबंध भी बेहद अहम हैं। ऐसे में बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच भारत के सामने अपने व्यापारिक हितों का संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा कितना बढ़ता है और भारत-ईरान के बीच चावल का कारोबार किस तरह प्रभावित होता है। आने वाले समय में इसका असर निर्यातकों, किसानों और घरेलू बाजार—तीनों पर दिखाई दे सकता है।
