मेड इन इंडिया हथियारों की दुनिया में बढ़ रही धाक, फिर भी पाकिस्तान से पीछे क्यों भारत? ब्रह्मोस, आकाश और पिनाका जैसे स्वदेशी हथियारों की बढ़ती मांग के बावजूद ग्लोबल डिफेंस एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी पाकिस्तान से कम क्यों है? जानिए पूरी कहानी। 🚀🛡️

भारत आज तेजी से अपनी रक्षा जरूरतों के लिए स्वदेशी हथियार और सैन्य तकनीक विकसित कर रहा है। मिसाइल से लेकर एयर डिफेंस सिस्टम और आर्टिलरी गन तक, भारतीय रक्षा उत्पादों की मांग दुनिया के कई देशों में बढ़ रही है। इसके बावजूद वैश्विक रक्षा निर्यात के आंकड़ों में भारत अभी पाकिस्तान से पीछे नजर आता है। आखिर इसकी वजह क्या है…..?
डिफेंस एक्सपोर्ट में भारत से आगे पाकिस्तान…….
वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच कई देश अपनी सैन्य क्षमता मजबूत करने में जुटे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया और दक्षिण चीन सागर में तनाव तक, दुनिया में रक्षा उपकरणों की मांग लगातार बढ़ रही है। स्वीडन के थिंक टैंक SIPRI के आंकड़ों के मुताबिक, दिए गए आंकड़ों में वैश्विक हथियार निर्यात में पाकिस्तान की हिस्सेदारी 0.4 फीसदी रही, जबकि भारत की हिस्सेदारी 0.2 फीसदी बताई गई। इस आधार पर पाकिस्तान भारत से ऊपर दिखाई देता है। लेकिन कहानी सिर्फ इन आंकड़ों तक सीमित नहीं है। भारत और पाकिस्तान का रक्षा उत्पादन और निर्यात मॉडल एक-दूसरे से काफी अलग है।
चीन की वजह से पाकिस्तान को मिलता है फायदा…….
पाकिस्तान के रक्षा निर्यात में चीन की बड़ी भूमिका है। दोनों देश मिलकर JF-17 Thunder जैसे लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर काम करते हैं। पाकिस्तान में इन विमानों की असेंबली और उत्पादन से जुड़े काम होते हैं और इन्हें दूसरे देशों को भी निर्यात किया गया है। म्यांमार, नाइजीरिया और अजरबैजान जैसे देशों को पाकिस्तान के जरिए चीनी-पाकिस्तानी रक्षा उत्पादों की आपूर्ति ने उसके निर्यात आंकड़ों को बढ़ाने में भूमिका निभाई है। यानी पाकिस्तान की ताकत का एक बड़ा हिस्सा उसके अपने अकेले रक्षा उद्योग के बजाय चीन के साथ साझेदारी और कम कीमत वाले रक्षा उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग से जुड़ा है।
भारत का फोकस लंबे समय तक आयात पर रहा…….
भारत के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग रही है। दशकों तक भारतीय सेना की जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशी हथियारों और सैन्य प्रणालियों के आयात से पूरा किया जाता रहा। भारत का घरेलू रक्षा उद्योग धीरे-धीरे मजबूत हुआ और लंबे समय तक देश का प्राथमिक लक्ष्य अपनी सेना की जरूरतें पूरी करना रहा। यही कारण है कि रक्षा निर्यात को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की दिशा में भारत ने अपेक्षाकृत बाद में तेजी दिखाई। अब तस्वीर तेजी से बदल रही है।
ब्रह्मोस से आकाश तक दुनिया में बढ़ रही मांग……..
भारत अब सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि रक्षा उपकरणों का बड़ा निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम और पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर जैसे स्वदेशी सिस्टम भारत की रक्षा निर्यात क्षमता को नई पहचान दे रहे हैं। फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है। वहीं, कई दूसरे देशों के साथ भी भारतीय रक्षा प्रणालियों को लेकर बातचीत और सौदे आगे बढ़ रहे हैं।
80 से ज्यादा देशों तक पहुंचा भारत……..
भारत की रक्षा निर्यात कहानी अब सिर्फ पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं है। देश के रक्षा उत्पाद और कंपोनेंट्स दुनिया के 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं। अमेरिका और फ्रांस जैसे विकसित देश भी भारत से रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई कंपोनेंट्स और तकनीकी उत्पाद खरीदते हैं। इनमें विमान के पुर्जे, फ्यूजलेज, मिश्र धातु, इलेक्ट्रॉनिक सब-सिस्टम और अन्य हाई-टेक उपकरण शामिल हैं। यह इस बात का संकेत है कि भारतीय रक्षा उद्योग सिर्फ कम कीमत वाले हथियारों के बाजार तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि हाई-टेक ग्लोबल सप्लाई चेन में भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए आगे की राह कितनी बड़ी है……?
भारत ने हाल के वर्षों में रक्षा उत्पादन और निर्यात दोनों को बढ़ाने पर जोर दिया है। सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में रक्षा निर्यात को और ऊंचाई तक ले जाना है। चुनौती भी कम नहीं है। वैश्विक हथियार बाजार में अमेरिका, फ्रांस, रूस, चीन और अन्य बड़े निर्यातकों की मजबूत पकड़ है। ऐसे में भारत को सिर्फ हथियार बनाने पर नहीं, बल्कि उनकी कीमत, गुणवत्ता, समय पर डिलीवरी, आफ्टर-सेल्स सपोर्ट और विश्वसनीय सप्लाई नेटवर्क पर भी ध्यान देना होगा।
पाकिस्तान से पीछे होना पूरी तस्वीर नहीं……
रक्षा निर्यात की रैंकिंग में पाकिस्तान से पीछे होना निश्चित तौर पर भारत के लिए एक दिलचस्प आंकड़ा है, लेकिन इसे दोनों देशों की सैन्य क्षमता की सीधी तुलना मानना सही नहीं होगा। भारत का रक्षा उद्योग तेजी से स्वदेशीकरण की ओर बढ़ रहा है और अब उसका लक्ष्य घरेलू जरूरतों के साथ-साथ वैश्विक बाजार में भी बड़ी हिस्सेदारी हासिल करना है। अगर ब्रह्मोस, आकाश, पिनाका और दूसरे स्वदेशी रक्षा उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग इसी तरह बढ़ती रही, तो आने वाले वर्षों में भारत की स्थिति वैश्विक डिफेंस एक्सपोर्ट मार्केट में काफी मजबूत हो सकती है। यानी आज भारत आंकड़ों में पीछे जरूर दिखाई दे रहा है, लेकिन जिस रफ्तार से ‘मेड इन इंडिया’ डिफेंस इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है, उससे आने वाले समय में तस्वीर काफी बदल सकती है।
