साधु के वेश में संसद पहुंचे पप्पू यादव के प्रदर्शन ने नई बहस छेड़ दी है। क्या कोई सांसद भेष बदलकर संसद आ सकता है? जानिए संसद के नियम, ड्रेस कोड और स्पीकर के अधिकार।

बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव एक बार फिर अपने अलग अंदाज को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने अयोध्या राम मंदिर के लिए जुटाए गए चंदे में कथित गड़बड़ी के विरोध में साधु का वेश धारण कर संसद परिसर में प्रदर्शन किया। उनके इस कदम ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है कि क्या कोई सांसद भेष बदलकर संसद पहुंच सकता है और क्या इसके लिए कोई कानूनी रोक है?
आइए जानते हैं संसद के नियम इस बारे में क्या कहते हैं।
साधु के वेश में क्यों पहुंचे पप्पू यादव?
पप्पू यादव ने संसद परिसर में साधु का वेश धारण कर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने राम मंदिर चंदे में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग उठाई। संसद परिसर में उनके प्रदर्शन को विपक्ष के कई नेताओं का समर्थन भी मिला। हालांकि यह प्रदर्शन संसद के भीतर नहीं बल्कि परिसर में किया गया था।
क्या सांसदों के लिए कोई ड्रेस कोड है?
भारतीय संविधान, लोकसभा और राज्यसभा के नियमों में सांसदों के लिए कोई अनिवार्य ड्रेस कोड तय नहीं किया गया है। भारत की सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सांसद अपनी परंपरागत या औपचारिक वेशभूषा पहन सकते हैं। संसद में अक्सर सांसदों को कुर्ता-पायजामा, धोती, साड़ी, सूट, मुंडू, मेखला-चादर और अन्य पारंपरिक परिधानों में देखा जाता है। हालांकि, सभी सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनका पहनावा संसद की गरिमा और संसदीय शिष्टाचार के अनुरूप हो।
क्या सांसद भेष बदलकर संसद आ सकते हैं?
संसदीय नियमों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो किसी सांसद को विशेष वेशभूषा या भेष धारण करने से रोकता हो। लेकिन यदि किसी प्रकार की वेशभूषा का उद्देश्य संसद की कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करना, प्रदर्शन करना या सदन की गरिमा को प्रभावित करना हो, तो उस पर आपत्ति की जा सकती है।
लोकसभा के नियम 349 के अनुसार सांसदों से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसा कोई व्यवहार न करें जिससे सदन की गरिमा प्रभावित हो। यदि कोई प्रतीकात्मक या नाटकीय वेशभूषा संसदीय मर्यादा के खिलाफ मानी जाती है, तो स्पीकर हस्तक्षेप कर सकते हैं।
नारे लिखे कपड़े और प्रदर्शन सामग्री पर रोक
संसदीय नियम सदन की कार्यवाही के दौरान राजनीतिक नारों या फिर संदेशों वाले कपड़ों के इस्तेमाल को भी प्रतिबंध करते हैं. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला यह साफ कर चुके हैं कि सदन के अंदर नारे लिखी टी-शर्ट या फिर कपड़े पहनना संसदीय शिष्टाचार का उल्लंघन है. इसी तरह सांसदों को कार्यवाही के दौरान सदन में तख्ती, झंडा, दान पेटी, बैनर या फिर विरोध प्रदर्शन की दूसरी प्रतीकात्मक सामग्री लाने की अनुमति नहीं है. इसका उद्देश्य इस बात को पक्का करना है कि बहस दृश्य प्रदर्शन के बजाय संसदीय प्रक्रियाओं के जरिए से आयोजित की जाए.
संसद परिसर और सदन के अंदर नियम अलग
संसद भवन के भीतर लोकसभा और राज्यसभा कक्षों में नियम सबसे अधिक सख्त होते हैं।
यदि कोई सांसद सदन के अंदर ऐसी वेशभूषा में पहुंचता है जिसे स्पीकर संसदीय मर्यादा के विपरीत मानते हैं, तो उन्हें कपड़े बदलने या सदन से बाहर जाने का निर्देश दिया जा सकता है। वहीं संसद परिसर के कुछ हिस्सों—जैसे गांधी प्रतिमा, मकर द्वार या हंस द्वार—पर सांसद समय-समय पर प्रतीकात्मक प्रदर्शन करते रहे हैं। ऐसे प्रदर्शन भी सुरक्षा नियमों और निर्धारित अनुमति के अधीन होते हैं।
नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?
अगर कोई भी सांसद नियम का उल्लंघन करता है या फिर सदन की गरिमा का अनादर करता है तो स्पीकर के पास कई अनुशासनात्मक शक्तियां होती हैं. अध्यक्ष पहले चेतावनी दे सकते हैं और सदस्य से वह व्यवहार बंद करने या फिर सदन से बाहर जाने के लिए कह सकते हैं. नियम 373 के तहत स्पीकर सदस्य का नाम ले सकते हैं जिसके बाद उन्हें उस दिन के बाकी समय के लिए सदन से बाहर जाना पड़ता है.
बार-बार या फिर गंभीर उल्लंघन के मामले में नियम 374 स्पीकर को यह अधिकार देता है कि वह व्यवहार की गंभीरता के आधार पर किसी सांसद को एक तय समय के लिए या फिर पूरे सत्र के लिए निलंबित कर सकते हैं.
क्या पप्पू यादव ने नियम तोड़े?
पप्पू यादव का साधु वेश में विरोध प्रदर्शन संसद परिसर में हुआ, न कि सदन की कार्यवाही के दौरान। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, केवल वेशभूषा धारण करना अपने आप में नियमों का उल्लंघन नहीं माना जाता। हालांकि यदि ऐसी वेशभूषा का उपयोग सदन के भीतर कार्यवाही बाधित करने या संसदीय मर्यादा के विरुद्ध किया जाए, तो स्पीकर परिस्थिति के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं।
