क्या कोरमा और कबाब सच में मुगलों की देन हैं?

भारत में खाने की बात हो और मुगलई व्यंजनों का जिक्र न हो, ऐसा मुश्किल ही है. मलाईदार ग्रेवी, खुशबूदार मसाले, मेवे, धीमी आंच पर पकाया गया मांस और तंदूर की खुशबू—मुगलई खानपान की यही खासियतें इसे दूसरी पाक शैलियों से अलग बनाती हैं.
लेकिन मुगलई खाने को लेकर एक सवाल हमेशा चर्चा में रहता है—क्या कोरमा, कबाब और बिरयानी जैसे व्यंजन वास्तव में मुगलों ने भारत में बनाए थे?
इस सवाल का जवाब इतना सीधा नहीं है. इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि मुगलई खानपान किसी एक व्यक्ति या एक दौर की बनाई हुई चीज नहीं था. यह मध्य एशिया, फारस, अफगानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप की अलग-अलग पाक परंपराओं के मेल से धीरे-धीरे विकसित हुआ. हाल ही में अभिनेत्री और लेखिका ट्विंकल खन्ना ने अपने ‘मिसेज फनीबोन्स’ कॉलम में महाराष्ट्र में फूड सेफ्टी को लेकर चल रही कार्रवाई के संदर्भ में मजाकिया अंदाज में मुगलई खाने और इतिहास का जिक्र किया. इसी बहाने कोरमा, कबाब और अन्य मुगलई व्यंजनों को लेकर चर्चा फिर सामने आ गई.
मुगलई खाने की शुरुआत कैसे हुई?
मुगल साम्राज्य की स्थापना भारत में 16वीं सदी की शुरुआत में हुई. मध्य एशिया से आए मुगल अपने साथ सिर्फ राजनीतिक परंपराएं ही नहीं, बल्कि खानपान की कई परंपराएं भी लेकर आए थे. उनके भोजन पर फारसी, तुर्की और मध्य एशियाई पाक शैली का प्रभाव था. भारत आने के बाद इन परंपराओं का सामना यहां मौजूद मसालों, अनाज, सब्जियों, डेयरी उत्पादों और स्थानीय पकाने की तकनीकों से हुआ.
समय के साथ शाही रसोइयों में दोनों संस्कृतियों का मेल होने लगा. स्थानीय सामग्री को विदेशी तकनीकों के साथ इस्तेमाल किया गया और इसी प्रयोग से एक नई पाक शैली विकसित हुई. आज जिसे हम मुगलई खाना कहते हैं, वह इसी लंबे सांस्कृतिक और पाक आदान-प्रदान का परिणाम माना जाता है.
क्या बाबर अपने साथ फारसी रसोइए लाए थे?
मुगलई खाने के इतिहास में बाबर का नाम भी अक्सर लिया जाता है. बाबर मध्य एशियाई संस्कृति से आए थे और उनके खानपान पर उस क्षेत्र की परंपराओं का प्रभाव था. लोकप्रिय कथाओं में कहा जाता है कि भारत आने के बाद उन्हें यहां के भोजन में अपने पसंद के स्वाद और विविधता की कमी महसूस हुई और शाही रसोई में फारसी तथा मध्य एशियाई प्रभाव बढ़ा.
हालांकि, इसे इस तरह कहना कि बाबर ने भारत में मुगलई खाना या उसके सभी प्रमुख व्यंजन शुरू कर दिए, ऐतिहासिक रूप से बहुत सरल निष्कर्ष होगा. वास्तविकता यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में पहले से ही समृद्ध पाक परंपराएं मौजूद थीं. मुगल काल में इन परंपराओं का मध्य एशियाई और फारसी प्रभावों के साथ व्यापक मेल हुआ.
शाहजहां और औरंगजेब के दौर में शाही खानपान
मुगल काल के आगे बढ़ने के साथ शाही रसोई भी अधिक विकसित होती गई. खासकर शाहजहां और औरंगजेब के समय शाही खानपान की परंपराओं ने एक विशिष्ट रूप लिया.
मुगल दरबारों में बड़ी संख्या में रसोइए काम करते थे. अलग-अलग रसोइयों की अलग-अलग विशेषज्ञता होती थी. कोई मांस पकाने में माहिर था तो कोई मिठाइयों, रोटियों या मसालों के इस्तेमाल में. शाही रसोई में स्वाद के साथ-साथ भोजन की खुशबू, रंग, बनावट और प्रस्तुति पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था. यही वह दौर था जब धीमी आंच पर खाना पकाने और मसालों तथा मेवों के इस्तेमाल जैसी तकनीकों को शाही खानपान में विशेष महत्व मिला.
दम पुख्त ने बदला पकाने का अंदाज
मुगलई खानपान की चर्चा दम पुख्त के बिना अधूरी है. इस तकनीक में बर्तन को अच्छी तरह बंद करके भोजन को धीमी आंच पर लंबे समय तक पकाया जाता है. इसका उद्देश्य सामग्री के स्वाद और खुशबू को धीरे-धीरे विकसित करना होता है.
हालांकि दम पुख्त को केवल मुगल दरबार तक सीमित करना भी सही नहीं होगा. भारतीय उपमहाद्वीप में धीमी आंच पर पकाने की कई पुरानी परंपराएं रही हैं. मुगलई और बाद की शाही रसोइयों ने इन तकनीकों को अलग-अलग सामग्रियों और स्वादों के साथ विकसित किया.
अब आते हैं उस सवाल पर जो सबसे ज्यादा पूछा जाता है—क्या कबाब मुगलों की देन है?
कबाब जैसी आग पर भुने या पकाए गए मांस की परंपराएं मुगल साम्राज्य से पहले भी पश्चिम और मध्य एशिया के कई हिस्सों में मौजूद थीं. भारतीय उपमहाद्वीप में भी दिल्ली सल्तनत और उससे पहले के दौर से मांस पकाने की अलग-अलग परंपराओं के प्रमाण और उल्लेख मिलते हैं. मुगल दौर में इन परंपराओं को शाही रसोई का संरक्षण मिला और भारतीय मसालों तथा स्थानीय तकनीकों के साथ इनके नए रूप विकसित हुए. यही वजह है कि आज कबाब की कई किस्में भारतीय खानपान का अभिन्न हिस्सा हैं.
सीख कबाब, शामी कबाब, गलौटी कबाब जैसी कई शैलियां अलग-अलग क्षेत्रों और दौर में विकसित हुईं. खासकर लखनऊ की कबाबी परंपरा ने कबाब को एक अलग पहचान दी, जहां बेहद मुलायम और मुंह में घुल जाने वाली बनावट पर विशेष जोर दिया गया. इसलिए यह कहना ज्यादा उचित होगा कि मुगलों ने कबाब का आविष्कार किया, इसके बजाय उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद और बाहर से आई मांस पकाने की परंपराओं को शाही संरक्षण और नया रूप देने में भूमिका निभाई.
कोरमा की कहानी भी इतनी सीधी नहीं
कोरमा का नाम सुनते ही दिमाग में गाढ़ी, मलाईदार और मेवेदार ग्रेवी की तस्वीर सामने आती है. आज कोरमा आमतौर पर दही, क्रीम, मेवे, मसालों और मांस के साथ तैयार किया जाता है. इसे धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे ग्रेवी गाढ़ी होती है और मसालों का स्वाद धीरे-धीरे विकसित होता है.
लेकिन क्या यह व्यंजन पूरी तरह मुगलों ने बनाया?
मुगल काल के भोजन का उल्लेख करने वाले ऐतिहासिक स्रोतों में कई तरह के मांस और शोरबे वाले व्यंजनों का जिक्र मिलता है, लेकिन आज हम जिस खास क्रीमी और मेवेदार कोरमे को जानते हैं, वह लंबे समय में विकसित हुई पाक शैली का परिणाम माना जाता है. फारसी और मध्य एशियाई शोरबा आधारित पकाने की परंपराओं का मेल भारतीय दही, मेवे, मसालों और अन्य स्थानीय सामग्रियों से हुआ. समय के साथ इससे कोरमे के अलग-अलग रूप विकसित हुए.
‘आइन-ए-अकबरी’ में क्या मिलता है?
मुगल खानपान की चर्चा में अक्सर ‘आइन-ए-अकबरी’ का नाम सामने आता है. यह अकबर के शासनकाल से जुड़ा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ है, जिसमें तत्कालीन प्रशासन, समाज और शाही व्यवस्था के साथ खानपान से जुड़ी जानकारी भी मिलती है.
लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि इसमें आज के समय में मिलने वाला बिल्कुल वही क्रीमी कोरमा दर्ज है.
खाने की रेसिपी समय के साथ बदलती रहती हैं. एक ही नाम का व्यंजन अलग-अलग क्षेत्रों और सदियों में अलग सामग्री और तकनीक से बनाया जा सकता है.
यही वजह है कि आधुनिक कोरमा को किसी एक समय या किसी एक समुदाय की ‘खोज’ बताना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा.
बिरयानी भी सिर्फ मुगल कहानी नहीं
मुगलई खाने की बात हो और बिरयानी का नाम न आए, यह संभव नहीं. बिरयानी को भी अक्सर मुगलों के साथ जोड़कर देखा जाता है. इसमें कोई शक नहीं कि मुगल और बाद की शाही रसोइयों ने चावल और मांस से बनने वाले कई शानदार व्यंजनों को संरक्षण और लोकप्रियता दी.
लेकिन चावल और मांस को मिलाकर पकाने की परंपराएं दुनिया के कई हिस्सों में अलग-अलग रूपों में मौजूद रही हैं. भारत में आने के बाद इन परंपराओं का स्थानीय मसालों, चावल की किस्मों और क्षेत्रीय तकनीकों के साथ मेल हुआ. इसी कारण आज भारत के अलग-अलग हिस्सों में बिरयानी की सैकड़ों क्षेत्रीय शैलियां देखने को मिलती हैं. हैदराबादी, लखनवी, कोलकाता और मालाबारी बिरयानी का स्वाद और तरीका एक-दूसरे से काफी अलग है.
मुगलई खाना असल में किसका मेल है?
अगर मुगलई खाने की पूरी कहानी को एक लाइन में समझना हो तो कहा जा सकता है कि यह एक पाक-सांस्कृतिक मेल है.
इसमें शामिल हैं:
- मध्य एशियाई पाक परंपराएं
- फारसी खानपान
- तुर्की प्रभाव
- अफगान परंपराएं
- भारतीय मसाले
- स्थानीय सामग्री
- भारतीय पकाने की तकनीकें
- अलग-अलग क्षेत्रों की शाही रसोइयों के प्रयोग
इन सभी प्रभावों ने मिलकर उस खानपान को जन्म दिया जिसे आज हम मुगलई व्यंजन कहते हैं.
