
नई दिल्ली, 31 मार्च।
1 अप्रैल 1889 को नागपुर के एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में जन्मे केशव बलिराम हेडगेवार ने बहुत कम उम्र में जीवन का सबसे कठिन दौर देखा। साल 1902 में नागपुर में प्लेग की महामारी फैली थी। उनके माता-पिता ने मरीजों की सेवा करते हुए अपनी जान की परवाह नहीं की और इसी दौरान दोनों संक्रमित हो गए। महज 13 साल की उम्र में केशव ने एक ही दिन अपने माता-पिता की चिताओं को जलते देखा।
बचपन से ही अंग्रेजों के खिलाफ भावना
हेडगेवार के मन में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गहरा विरोध बचपन से ही था। 1897 में जब वे मात्र आठ वर्ष के थे, तब महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती पर बांटी गई मिठाइयों को उन्होंने यह कहते हुए कूड़ेदान में फेंक दिया कि किसी विदेशी सत्ता का जश्न मनाना मातृभूमि का अपमान है।
हाई स्कूल के दौरान ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाने पर उन्हें स्कूल से भी निकाल दिया गया था।
मेडिकल की पढ़ाई और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
1910 में हेडगेवार मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता गए। डॉक्टर बनने के बाद वे नागपुर लौट आए, लेकिन उन्होंने कभी चिकित्सा प्रैक्टिस नहीं की। वे सीधे कांग्रेस से जुड़े और 1921 के असहयोग आंदोलन में उग्र भाषण देने के आरोप में एक साल की कठोर सजा भी काटी।
वैचारिक मंथन और संघ की स्थापना
जेल से रिहा होने के बाद हेडगेवार के मन में गहरा वैचारिक मंथन शुरू हुआ। महात्मा गांधी द्वारा खिलाफत आंदोलन के समर्थन और देशभर में हुए सांप्रदायिक दंगों ने उन्हें झकझोर दिया।
उन्होंने महसूस किया कि अंग्रेज भारत पर केवल सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आपसी फूट, छुआछूत और बिखराव के कारण शासन कर रहे हैं।
इस विचार से प्रेरित होकर 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में कुछ युवाओं के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की गई।
सामाजिक एकता का प्रयोग बनी ‘शाखा’
हेडगेवार ने ‘शाखा’ को सिर्फ शारीरिक व्यायाम का स्थान नहीं बनाया, बल्कि इसे सामाजिक समानता का माध्यम बनाया। अलग-अलग जातियों और आर्थिक वर्गों के युवा एक ही गणवेश में साथ खेलते और साथ भोजन करते थे, जिससे समाज में मौजूद भेदभाव की दीवारें धीरे-धीरे कमजोर होने लगीं।
स्वतंत्रता आंदोलन में भी भागीदारी
हालांकि उन्होंने संघ को दलगत राजनीति से दूर रखा, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम से कभी दूरी नहीं बनाई।
1930 में गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उन्होंने सरसंघचालक का पद छोड़कर ‘जंगल सत्याग्रह’ में हिस्सा लिया और नौ महीने अकोला जेल में सजा काटी।
इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि लाहौर षड्यंत्र केस के बाद क्रांतिकारी राजगुरु जब फरार थे, तब हेडगेवार ने उन्हें नागपुर में गुप्त पनाह दी थी।
विरासत और प्रभाव
21 जून 1940 को 51 वर्ष की आयु में हेडगेवार का निधन हो गया, लेकिन तब तक वे एक ऐसा बीज बो चुके थे जो आगे चलकर विशाल संगठन में बदल गया।
1989 में उनके जन्म शताब्दी वर्ष पर संघ ने देशव्यापी जनसंपर्क अभियान चलाया। कार्यकर्ता 2 लाख 16 हजार से अधिक गांवों में पहुंचे और लगभग 1.5 करोड़ परिवारों से संपर्क किया। इस अभियान के जरिए करीब 11 करोड़ रुपये की सेवा निधि जुटाई गई, जिसका उपयोग आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल और व्यावसायिक केंद्र स्थापित करने में किया गया।
बाद में 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने डॉ. हेडगेवार के सम्मान में आधिकारिक डाक टिकट जारी किया।
