
नई दिल्ली, 26 मार्च। भारत में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान क्रेडिट ग्रोथ में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में कर्ज (लोन) की वृद्धि 61 प्रतिशत तक बढ़ गई, जिसमें रिटेल ग्राहकों और एमएसएमई सेक्टर की मजबूत मांग का अहम योगदान रहा।
25.1 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचा क्रेडिट फ्लो
यस बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में कुल क्रेडिट फ्लो बढ़कर 25.1 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया, जो लगभग 26.1 लाख करोड़ रुपए के डिपॉजिट के बराबर है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि रिटेल, एमएसएमई और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में बढ़ती मांग इस तेजी की प्रमुख वजह रही है।
बढ़ा क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो
हालांकि वित्त वर्ष 2024 से डिपॉजिट ग्रोथ की रफ्तार कुछ धीमी हुई है, जिससे बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी पर हल्का दबाव देखने को मिला है।
इसके चलते क्रेडिट-डिपॉजिट (C/D) रेशियो बढ़कर 82.4 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो पिछले 10 वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर है।
रिटेल लोन बना सबसे बड़ा ड्राइवर
रिपोर्ट के अनुसार, रिटेल लोन इस ग्रोथ का सबसे बड़ा कारक बनकर उभरा है। पर्सनल लोन की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत से बढ़कर 33 प्रतिशत हो गई है।
टैक्स में राहत और जीएसटी से जुड़े फायदों के कारण लोगों की आय में सुधार हुआ है, जिससे लोन लेने की क्षमता भी बढ़ी है।
इस सेगमेंट में वाहन लोन सबसे बड़ा ड्राइवर बनकर सामने आया है, जिसने वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही से हाउसिंग लोन को भी पीछे छोड़ दिया।
सुरक्षित लोन की ओर बढ़ रहा रुझान
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अब लोग सुरक्षित (Secured) लोन की ओर अधिक झुकाव दिखा रहे हैं, जबकि बिना गारंटी वाले लोन की ग्रोथ धीमी हो गई है।
MSME सेक्टर का बड़ा योगदान
औद्योगिक क्रेडिट में भी सुधार देखने को मिला है, जिसमें एमएसएमई सेक्टर की अहम भूमिका रही।
अब यह सेक्टर कुल औद्योगिक कर्ज का करीब एक-तिहाई हिस्सा बन चुका है।
सरकार की योजनाओं, जैसे क्रेडिट गारंटी स्कीम और एमएसएमई की नई परिभाषा, ने इस क्षेत्र में कर्ज वृद्धि को बढ़ावा दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइज ने 2.38 लाख करोड़ रुपए का कर्ज जोड़ा, जबकि मीडियम एंटरप्राइज ने 63,000 करोड़ रुपए का योगदान दिया।
आगे के लिए जताई गई सावधानी
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वित्त वर्ष 2027 में क्रेडिट ग्रोथ की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है।
इसके पीछे तेल की बढ़ती कीमतें, कमजोर निर्यात और खाद्य महंगाई जैसे कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। इसके अलावा जीएसटी से मिलने वाले फायदों का असर कम होने से भी लोन की मांग पर असर पड़ सकता है।
