अगर आप 15 अगस्त 1947 की सुबह उठते तो? बिना इंटरनेट, बिना सोशल मीडिया और बिना स्मार्टफोन… लेकिन आजादी का जश्न दिल से!

Imagine करो, सुबह के 6 बज रहे हैं और आप अचानक 15 August 1947 की सुबह सोकर उठते हो। No smartphones, no internet. सिर्फ एक अलग ही लेवल की वाइब
अलमारी में कोई Zara या H&M नहीं मिलेगा, लड़कों के लिए सिंपल खादी कुर्ता-पायजामा या धोती, और लड़कियों के लिए कॉटन साड़ियां या सूट। एकदम सस्टेनेबल और प्योर खादी वाइब्स, zero fast fashion
सुबह-सुबह कोई गुड मॉर्निंग वॉट्सऐप फॉरवर्ड या इंस्टा स्टोरीज नहीं हैं। लोग ऑल इंडिया रेडियो पर नेहरू जी की Tryst with Destiny स्पीच सुन रहे हैं। न्यूज़पेपर और टेलीग्राम का क्रेज़ है
अब बाहर निकलना है, पर Uber या रैपिडो कहाँ है? सड़कों पर सिर्फ ताँगे, बैलगाड़ियां और साइकिलें दिखेंगी। एकाध विंटेज एम्बेसडर कार दिख गई तो समझो वो उस ज़माने का आईफोन है
सड़कों पर जो माहौल है ना, वो सच में hits different! हर तरफ तिरंगा लहरा रहा है, लोग गले मिल रहे हैं, रो रहे हैं, और हवा में जय हिंद गूंज रहा है। सालों की गुलामी के बाद आज़ादी की पहली सुबह का सुकून चेहरों पर साफ दिख रहा है।
बिना इंटरनेट और सोशल मीडिया के, क्या आप 1947 के इंडिया में एक दिन भी सरवाइव कर पाते? कमेंट्स सेक्शन में जरूर बताएं
