गोली लगी, फेफड़ा घायल हुआ, लेकिन जेल की चाबी नहीं छोड़ी!

बुधवार की सुबह, जेल में चहल-पहल थी। इसी दौरान हत्या के मामले में बंद एक हिस्ट्रीशीटर कैदी हाथ में फलों की टोकरी लेकर मुख्य गेट की तरफ बढ़ता है। बाहर से देखने वाले को लगा कि शायद त्योहार की वजह से फल ले जाए जा रहे हैं, लेकिन उस टोकरी के पीछे, नीलेश ने अपनी कमर में एक लोडेड कट्टा छिपा रखा था। यह हथियार जेल की ऊंची दीवारों के ऊपर से किसी मददगार ने अंदर फेंका था।
वह कैदी मुख्य गेट पर तैनात प्रहरी दिग्विजय सिंह तोमर के पास पहुंचता है और अचानक कट्टा तान देता है और जेल की चाबी छीनने की कोशिश करता है। दिग्विजय सिंह, जो अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद थे, पीछे नहीं हटते। दोनों के बीच एक भयानक हाथापाई शुरू हो जाती है। अपने प्लान को नाकाम होता देख, बौखलाए कैदी ने ट्रिगर दबा दिया।
एक जोरदार धमाका होता है। गोली प्रहरी दिग्विजय की पीठ को चीरती हुई सीधे फेफड़े में जा धंसती है। गोली लगने के बाद साधारण इंसान हिम्मत हार जाता है, लेकिन दिग्विजय सिंह तोमर आम इंसान नहीं थे। खून से लथपथ होने और असहनीय दर्द के बावजूद, उन्होंने जेल की चाबी नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए घायल अवस्था में भी आरोपी और खूंखार कैदी नीलेश को कसकर पकड़े रखा। उनकी इस बहादुरी ने जेल ब्रेक की एक बहुत बड़ी साजिश को नाकाम कर दिया।
गोली की आवाज सुनते ही जेल में हड़कंप मच गया। मौके पर मौजूद महिला प्रहरी भारती राजपूत ने बिना वक्त गंवाए शोर मचाया और बाकी स्टाफ को अलर्ट किया। महज कुछ ही सेकेंड्स के भीतर, दूसरे प्रहरियों ने दौड़कर आरोपी नीलेश को चारों तरफ से घेर लिया और उसे दबोच लिया।
घायल प्रहरी दिग्विजय सिंह को तुरंत जिला अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टर अभिषेक सागर की टीम ने देखा कि फेफड़ों में पानी भरने के कारण उनकी हालत बेहद गंभीर हो चुकी थी। उन्हें तुरंत भोपाल एम्स रेफर किया गया, जहाँ डॉक्टरों ने एक जटिल ऑपरेशन करके उनकी जान बचाई। फिलहाल वे डॉक्टरों की निगरानी में हैं।
इस पूरी घटना ने जेल प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। घटना के तुरंत बाद डीजी जेल संजय चौधरी ने जेल अधीक्षक आरके चौरे को सस्पेंड कर दिया। वहीं कलेक्टर ने इस पूरे मामले की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए हैं।
ऐसे में कुछ बड़े सवाल जो प्रशासन पर उठते हैं, जिनका जवाब बाकी है:
जेल की इतनी कड़ी सुरक्षा और पेट्रोलिंग के बावजूद बाहर से कट्टा अंदर कैसे पहुंच गया?
200 से ज्यादा गंभीर अपराधियों वाली जेल में सिर्फ 14 प्रहरी क्यों तैनात थे?
स्टाफ की इतनी कमी क्यों थी?
रक्षाबंधन जैसे बड़े कार्यक्रम के लिए जेल में अतिरिक्त सुरक्षा घेरा क्यों नहीं बनाया गया था?
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारे सुरक्षाकर्मी किस तरह अपनी जान हथेली पर रखकर अपनी ड्यूटी निभाते हैं।
प्रहरी दिग्विजय सिंह तोमर के इस जज्बे और बहादुरी को पूरा देश सलाम कर रहा है!
