क्या बच्चे के जन्म से पहले उसके IQ का पता लगाया जा सकता है? जानिए इस नई जेनेटिक तकनीक के दावे, फायदे, सीमाएं और एक्सपर्ट्स की चिंता।

पॉलिजेनिक स्क्रीनिंग को लेकर इन दिनों दुनियाभर में चर्चा तेज है। दावा किया जा रहा है कि IVF के जरिए बनाए गए भ्रूणों के जेनेटिक डेटा का विश्लेषण करके भविष्य में बच्चे के कुछ गुणों और बीमारियों के जोखिम का अनुमान लगाया जा सकता है। इनमें IQ, लंबाई और कुछ अन्य शारीरिक या स्वास्थ्य संबंधी विशेषताएं भी शामिल हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसे किसी बच्चे का भविष्य निश्चित रूप से बताने या “परफेक्ट बच्चा” चुनने की तकनीक समझना सही नहीं है।
क्या है Polygenic Screening?
पॉलिजेनिक स्क्रीनिंग एक तरह की जेनेटिक विश्लेषण प्रक्रिया है। इसमें किसी व्यक्ति के DNA में मौजूद कई अलग-अलग आनुवंशिक बदलावों को एक साथ देखा जाता है। इन बदलावों के आधार पर किसी विशेष बीमारी या लक्षण के प्रति संभावित जोखिम का अनुमान लगाने के लिए Polygenic Risk Score (PRS) जैसी गणनाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह तकनीक खास तौर पर IVF के संदर्भ में चर्चा में आई है। IVF प्रक्रिया में एक से अधिक भ्रूण तैयार हो सकते हैं। कुछ कंपनियां इन भ्रूणों के जेनेटिक डेटा का विश्लेषण करके अलग-अलग स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों और कुछ तथाकथित traits के बारे में अनुमान उपलब्ध कराने का दावा करती हैं।
यहीं से सवाल उठता है कि क्या माता-पिता अपने बच्चे के जन्म से पहले ही उसके IQ या दूसरी विशेषताओं के बारे में जान सकते हैं?
क्या वास्तव में बच्चे का IQ पहले से पता लगाया जा सकता है?
इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर हां नहीं है। IQ जैसी जटिल विशेषताएं केवल कुछ जीन से तय नहीं होतीं। इनमें बड़ी संख्या में आनुवंशिक कारकों के साथ-साथ वातावरण, शिक्षा, पोषण, सामाजिक परिस्थितियां, परिवार का माहौल और बचपन के अनुभव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए किसी भ्रूण के DNA के आधार पर यह कहना कि वह भविष्य में निश्चित रूप से कितना IQ हासिल करेगा, वैज्ञानिक रूप से बहुत बड़ा दावा होगा।
जेनेटिक स्कोर किसी संभावित प्रवृत्ति या सांख्यिकीय संभावना का संकेत दे सकते हैं, लेकिन वे किसी व्यक्ति के भविष्य का निश्चित परिणाम नहीं बताते।
“परफेक्ट बच्चा” चुनने का दावा कितना सही?
पॉलिजेनिक स्क्रीनिंग को लेकर “परफेक्ट बच्चा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल काफी आकर्षक लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह बेहद भ्रामक हो सकता है। किसी बच्चे की लंबाई, बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य या दूसरी विशेषताओं को केवल जीन के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की आनुवंशिक क्षमता होने के बावजूद उसका वास्तविक विकास उसके आसपास के वातावरण और जीवन परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। इसी वजह से विशेषज्ञ इस तरह की तकनीक के प्रचार में इस्तेमाल होने वाले “बेहतर”, “होशियार” या “परफेक्ट” जैसे शब्दों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।
कंपनियां किस आधार पर करती हैं यह अनुमान?
पॉलिजेनिक स्कोरिंग में हजारों या कभी-कभी उससे भी ज्यादा आनुवंशिक संकेतों को एक साथ विश्लेषित किया जा सकता है। इन संकेतों और किसी खास trait या बीमारी के बीच पहले से मौजूद सांख्यिकीय संबंधों के आधार पर एक स्कोर तैयार किया जाता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—सांख्यिकीय संबंध का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के बारे में परिणाम निश्चित होगा।
अगर किसी भ्रूण का किसी बीमारी के लिए जेनेटिक जोखिम अपेक्षाकृत कम पाया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे वह बीमारी कभी नहीं होगी। इसी तरह किसी trait के लिए अपेक्षाकृत ऊंचा स्कोर भविष्य के वास्तविक परिणाम की गारंटी नहीं देता।
एक्सपर्ट्स क्यों जता रहे हैं चिंता?
इस तकनीक को लेकर वैज्ञानिक और नैतिक विशेषज्ञ कई तरह के सवाल उठा रहे हैं।
1. IQ बेहद जटिल विशेषता है
बुद्धिमत्ता पर जीन का प्रभाव जरूर होता है, लेकिन यह केवल आनुवंशिक कारणों से निर्धारित नहीं होती। शिक्षा, पोषण, सामाजिक वातावरण, परिवार और व्यक्तिगत अनुभव जैसे कई कारक बच्चे के विकास को प्रभावित करते हैं।
इसलिए केवल DNA देखकर किसी बच्चे के भविष्य के IQ का सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं माना जा सकता।
2. एक ही आनुवंशिक बदलाव के कई प्रभाव हो सकते हैं
मानव शरीर में जीन एक-दूसरे से अलग-अलग काम नहीं करते। एक आनुवंशिक बदलाव कई traits या स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा हो सकता है। ऐसे में किसी एक वांछित विशेषता के लिए भ्रूण चुनने की कोशिश में दूसरे संभावित प्रभावों को नजरअंदाज करना जोखिम पैदा कर सकता है।
3. हर आबादी में परिणाम समान नहीं हो सकते
Polygenic scores की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि उनका प्रदर्शन अलग-अलग आनुवंशिक आबादी में अलग हो सकता है। जिन लोगों के आनुवंशिक डेटा पर कोई मॉडल विकसित हुआ है, जरूरी नहीं कि वह दुनिया की हर आबादी पर उसी सटीकता से काम करे।
इसलिए ऐसे स्कोर को सार्वभौमिक भविष्यवाणी मानना उचित नहीं है।
4. “यूजेनिक्स” की चिंता
सबसे गंभीर नैतिक चिंताओं में से एक यूजेनिक्स से जुड़ी है। यूजेनिक्स ऐसी ऐतिहासिक सोच और प्रथाओं से जुड़ा शब्द है जिसमें कुछ आनुवंशिक विशेषताओं वाले लोगों को दूसरों से बेहतर मानने की कोशिश की गई।
विशेषज्ञों को डर है कि अगर तकनीक का इस्तेमाल “बेहतर जीन” या “बेहतर बच्चे” चुनने की दिशा में होने लगा, तो इससे सामाजिक असमानता और भेदभाव को बढ़ावा मिल सकता है।
क्या माता-पिता बच्चे की आंखों का रंग या लंबाई भी चुन सकते हैं?
कुछ कंपनियां पॉलिजेनिक विश्लेषण के जरिए कई traits के बारे में अनुमान देने का दावा करती हैं। लेकिन किसी trait के लिए आनुवंशिक संभावना का अनुमान और उस trait को निश्चित रूप से चुन पाना दो अलग बातें हैं। उदाहरण के लिए, किसी बच्चे की संभावित लंबाई या आंखों के रंग पर कई आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों का प्रभाव हो सकता है। इसलिए ऐसे परिणामों को भविष्य की पक्की तस्वीर नहीं माना जा सकता।
IVF में जेनेटिक स्क्रीनिंग का इस्तेमाल नया नहीं है
यह भी समझना जरूरी है कि भ्रूणों की जेनेटिक जांच अपने आप में कोई नई अवधारणा नहीं है। IVF के दौरान Preimplantation Genetic Testing (PGT) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कुछ आनुवंशिक बीमारियों या क्रोमोसोम से जुड़ी समस्याओं की पहचान के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य गंभीर आनुवंशिक स्थितियों के जोखिम के बारे में चिकित्सकीय जानकारी उपलब्ध कराना हो सकता है।
Polygenic screening इससे अलग और अधिक विवादास्पद क्षेत्र है, क्योंकि इसमें कई जीन से जुड़े संभावित जोखिमों या जटिल traits का अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है।
क्या इससे हर माता-पिता अपने बच्चे को “परफेक्ट” बना पाएंगे?
पॉलिजेनिक स्क्रीनिंग किसी बच्चे के भविष्य की गारंटी नहीं देती। यह अधिक से अधिक कुछ आनुवंशिक संभावनाओं या जोखिमों का सांख्यिकीय अनुमान दे सकती है। इसके अलावा, IVF में उपलब्ध भ्रूणों की संख्या भी सीमित हो सकती है, इसलिए माता-पिता के पास असीमित विकल्प नहीं होते।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव विकास को केवल जीन के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
भारत में क्या स्थिति है?
भारत में भी assisted reproductive technology और जेनेटिक टेस्टिंग से जुड़े नियम मौजूद हैं। लेकिन किसी भी व्यावसायिक दावे को केवल इसलिए वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता क्योंकि कोई कंपनी ऐसी सेवा उपलब्ध कराने का दावा कर रही है। भारत में ऐसी तकनीकों की उपलब्धता, वैधता और चिकित्सकीय उपयोग से जुड़े नियम समय के साथ बदल सकते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को ऐसी प्रक्रिया अपनाने से पहले योग्य डॉक्टर और जेनेटिक काउंसलर से सलाह लेनी चाहिए।
Disclaimer: जेनेटिक टेस्टिंग या IVF से जुड़ा कोई भी निर्णय सोशल मीडिया या विज्ञापन में किए गए दावों के आधार पर न लें। ऐसी किसी प्रक्रिया पर विचार करते समय विशेषज्ञ डॉक्टर और प्रमाणित जेनेटिक काउंसलर से चिकित्सकीय सलाह जरूर लें।
