धमकियों के बीच श्रीनगर में गणेशोत्सव की धूम! 🙏 गणपतियार मंदिर में उमड़े श्रद्धालु, पांचवें साल सार्वजनिक रूप से मनाया गया गणेशोत्सव।

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में गणेश चतुर्थी के मौके पर श्रद्धालुओं ने गणपतियार मंदिर में पहुंचकर भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की। कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिल रही कथित धमकियों के बीच भी समुदाय ने उत्साह के साथ गणेशोत्सव मनाया। इस दौरान अलग-अलग समुदायों के लोगों की भागीदारी भी देखने को मिली।
सदियों पुराने गणपतियार मंदिर में जुटे श्रद्धालु……
श्रीनगर के पुराने शहर के हब्बा कदल इलाके में स्थित गणपतियार मंदिर कश्मीर के प्रमुख प्राचीन गणेश मंदिरों में से एक माना जाता है। मंदिर की गर्भगृह में मौजूद गणेश प्रतिमा को लेकर मान्यता है कि यह करीब 800 से 900 साल पुरानी है। मंदिर से जुड़ा इतिहास भी काफी पुराना बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, अफगान शासन के दौरान मूल प्रतिमा को झेलम नदी में फेंक दिया गया था। बाद में महाराजा गुलाब सिंह के शासनकाल में नदी का जलस्तर कम होने पर प्रतिमा को दोबारा प्राप्त किया गया।
घाटी में सार्वजनिक गणेशोत्सव का पांचवां साल…..
श्रीनगर में सार्वजनिक तौर पर गणेशोत्सव मनाने की शुरुआत 2022 में हुई थी। इस साल यह लगातार पांचवां वर्ष है जब घाटी में सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव आयोजित किया जा रहा है। अब यह आयोजन केवल गणपतियार मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रीनगर के इंदिरा नगर और विश्वकुलगाम तक भी इसका विस्तार हुआ है। आयोजकों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में इस उत्सव में लोगों की भागीदारी लगातार बढ़ी है।
पुणे से लाई गईं इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं…..
कश्मीर में पारंपरिक गणेश प्रतिमाएं तैयार करने वाले स्थानीय कारीगरों की कमी के कारण आयोजकों ने पुणे के श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति ट्रस्ट के साथ सहयोग किया है। इसी सहयोग के तहत पुणे की प्रमुख ‘मानाचे’ गणपति प्रतिमाओं की प्रतिकृतियां श्रीनगर भेजी गई हैं। इनमें श्री कसबा गणपति, श्री तांबडी जोगेश्वरी और गणपति गुरुजी तालीम की प्रतिकृतियां शामिल हैं। इन प्रतिमाओं को घाटी तक पहुंचाने और आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं में पुणे ट्रस्ट तथा श्रीनगर की गणपतियार प्रबंधक समिति ने सहयोग किया।
“यह सिर्फ कश्मीरी पंडितों का कार्यक्रम नहीं”…..
कश्मीरी पंडित नेता मोहित भान ने गणेशोत्सव को कश्मीर की साझा संस्कृति से जोड़ते हुए कहा कि इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के लोग भी हिस्सा लेते हैं। उनके मुताबिक, लोग एक-दूसरे के साथ प्रसाद बांटते हैं और उत्सव में शामिल होते हैं। कार्यक्रम में हवन, सामूहिक प्रार्थना और प्रसाद वितरण जैसी गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। आयोजकों के अनुसार, सात दिनों के बाद गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन श्रीनगर के अलग-अलग स्थानों पर किया जाएगा।
धमकियों के बीच सुरक्षा पर भी नजर…..
गणेशोत्सव का आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब घाटी में हिंदू समुदाय और कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को लेकर कथित धमकियों की खबरें सामने आई हैं। इसके बावजूद समुदाय के लोगों ने उत्सव को जारी रखने का फैसला किया। कश्मीरी पंडित नेताओं का कहना है कि सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। किसी भी धमकी को हल्के में लेने के बजाय सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन की निगरानी महत्वपूर्ण बनी हुई है।
घरों में ‘पान दान’ की भी परंपरा…..
कश्मीरी पंडित समुदाय में गणेश चतुर्थी मनाने की परंपरा केवल सार्वजनिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। कई परिवार पारंपरिक रूप से घरों में ‘पान’ या ‘पान दान’ नामक रस्म के जरिए यह पर्व मनाते हैं। इस परंपरा में कलश स्थापित करने के साथ घास, चावल, जौ, लड्डू और ‘रोथ’ नामक मीठी तली हुई रोटी अर्पित की जाती है। सार्वजनिक गणेशोत्सव के बढ़ने के बावजूद घरों में मनाई जाने वाली यह पारंपरिक पूजा भी जारी है।
धार्मिक उत्सव से आगे सामाजिक जुड़ाव…..
पिछले कुछ वर्षों में श्रीनगर में गणेशोत्सव में लोगों की भागीदारी बढ़ी है। गणपतियार मंदिर में होने वाला आयोजन अब धार्मिक कार्यक्रम के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल का अवसर भी बन रहा है। समुदाय के लोगों के लिए यह उत्सव अपनी परंपराओं से जुड़ने और एक-दूसरे के साथ खुशियां साझा करने का माध्यम है। धमकियों और चुनौतियों के बीच भी गणेशोत्सव का यह आयोजन श्रीनगर में धार्मिक आस्था और सामाजिक भागीदारी की तस्वीर पेश करता है।
