धर्मशाला के जंगलों में आग ने मचाई भारी तबाही! 80 घटनाओं में 347 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ, जबकि करीब 92 लाख रुपये की वन संपदा जलकर खाक हो गई।

धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला वन मंडल में इस वर्ष जंगलों में लगी आग ने भारी तबाही मचाई है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार अब तक आग लगने की 80 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें करीब 347 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इन घटनाओं में वन संपदा को लगभग 92 लाख रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है।
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि गर्मी और लंबे समय तक बारिश न होने के कारण जंगलों में सूखी घास और पत्तियां बड़ी मात्रा में जमा हो गई थीं, जिससे आग तेजी से फैलती गई। कई इलाकों में स्थानीय लोगों और वन कर्मियों की मदद से आग पर काबू पाया गया, लेकिन तब तक वन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो चुका था।
वन्यजीवों और पर्यावरण पर असर
विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में बार-बार लगने वाली आग केवल पेड़ों और वनस्पतियों को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को भी प्रभावित करती है। इससे जैव विविधता पर नकारात्मक असर पड़ता है और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है।
मानव गतिविधियां भी बन रहीं वजह
वन विभाग की प्रारंभिक जांच में कई मामलों में मानवीय लापरवाही को आग लगने का कारण माना गया है। जंगलों में फेंकी गई जलती बीड़ी-सिगरेट, पिकनिक के दौरान छोड़ी गई आग और सूखी घास जलाने जैसी गतिविधियां आग फैलने की प्रमुख वजह बन रही हैं।
विभाग ने बढ़ाई निगरानी
घटनाओं को देखते हुए वन विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी है। फॉरेस्ट गार्ड्स की अतिरिक्त तैनाती की गई है और स्थानीय लोगों से भी आग लगने की सूचना तुरंत देने की अपील की गई है। विभाग ने कहा है कि जंगलों में आग लगाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
बारिश से मिलेगी राहत की उम्मीद
मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दिनों में मानसून की सक्रियता बढ़ने की संभावना है। यदि क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है तो जंगलों में आग की घटनाओं पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बारिश पर निर्भर रहने के बजाय वन संरक्षण के लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनाने की जरूरत है।
धर्मशाला वन मंडल में आग की लगातार बढ़ती घटनाएं पर्यावरण संरक्षण के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। ऐसे में प्रशासन, वन विभाग और स्थानीय समुदाय के संयुक्त प्रयास ही इस समस्या का स्थायी समाधान निकाल सकते हैं।
