प्रस्तावना

देश को झकझोर देने वाले कफ सिरप से बच्चों की मौत के मामले ने एक बार फिर दवा सुरक्षा और नियमन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में जहरीला कफ सिरप पीने से अब तक कम से कम 14 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस घटना के बाद वकील विशाल तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है, जिसमें सीबीआई जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।
याचिका में उठाए गए मुख्य बिंदु
वकील विशाल तिवारी द्वारा दायर याचिका में निम्नलिखित मांगें की गई हैं:
- डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकॉल (EG) जैसे जहरीले रसायनों की बिक्री और उपयोग पर सख्त नियंत्रण।
- सिरप में पाए गए विषैले तत्वों की फॉरेंसिक जांच के बाद आपराधिक जिम्मेदारी तय की जाए।
- जांच राष्ट्रीय न्यायिक आयोग या सीबीआई के तहत हो और इसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज करें।
- सभी राज्यों में दर्ज एफआईआर को एकीकृत कर एक ही जांच एजेंसी के हवाले किया जाए।
- प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और ड्रग्स रिकॉल पॉलिसी बनाने की सिफारिश।
जहरीले रसायनों का खुलासा

रिपोर्ट के मुताबिक, कोल्ड्रिफ कफ सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल की मात्रा 48.6% तक पाई गई, जो मानक सीमा से करीब 500 गुना अधिक है।
- यह रसायन औद्योगिक उपयोग के लिए बनाया जाता है, न कि दवाओं के लिए।
- शरीर में जाने पर यह किडनी फेलियर और मल्टी-ऑर्गन डैमेज का कारण बनता है।
- मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में 9, राजस्थान में 2, और तमिलनाडु में 3 बच्चों की मौत की पुष्टि हुई है।
केंद्र और राज्यों की भूमिका
केंद्र सरकार ने इस सिरप पर तात्कालिक प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन याचिका में आरोप लगाया गया है कि जांच में गंभीर लापरवाही हुई है।
राज्यों के स्वास्थ्य विभागों पर यह सवाल उठ रहे हैं कि इतनी खतरनाक दवा मार्केट में कैसे पहुंची, और क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम ने इसे पहले क्यों नहीं पकड़ा।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका की प्रमुख मांगें
- सीबीआई या उच्च स्तरीय समिति द्वारा जांच।
- दोषी कंपनियों के लाइसेंस तुरंत रद्द किए जाएं।
- विषैले सिरप के सभी स्टॉक को बाजार से हटाया जाए।
- ड्रग रिकॉल पॉलिसी बनाकर दवा सुरक्षा को कानूनी रूप दिया जाए।
- पीड़ित परिवारों को वित्तीय सहायता और मुआवजा दिया जाए।
एनएचआरसी की कार्रवाई
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मध्य प्रदेश और राजस्थान के स्वास्थ्य सचिवों को नोटिस जारी किया है।
- आयोग ने पूछा है कि बच्चों की मौत के मामलों में क्या कार्रवाई की गई और कौन जिम्मेदार अधिकारी दोषी पाए गए हैं।
- आयोग ने चार सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
विपक्ष और सरकार की प्रतिक्रिया
- विपक्षी दलों ने इसे “नियामक एजेंसियों की विफलता” करार दिया है।
- स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि दोषियों के खिलाफ “कड़ी से कड़ी कार्रवाई” की जाएगी और “दवा उत्पादन इकाइयों का ऑडिट” शुरू कर दिया गया है।
पूर्व घटनाओं से तुलना
भारत में इससे पहले भी डाइएथिलीन ग्लाइकॉल विषाक्तता के कई मामले सामने आ चुके हैं:
- 2022 में गाम्बिया (अफ्रीका) में भारतीय कंपनी की दवा से 70 बच्चों की मौत हुई थी।
- 2020 में जम्मू-कश्मीर में भी DEG युक्त सिरप से 12 बच्चों की मौत हुई थी।
इन घटनाओं के बाद भी दवा नियमन में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ।
विशेषज्ञों की राय
फार्मास्यूटिकल विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में ड्रग क्वालिटी कंट्रोल और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर है।
- राज्य स्तरीय प्रयोगशालाओं में सैंपल टेस्टिंग की क्षमता सीमित है।
- कई बार कंपनियां सस्ते उत्पादन के लिए घटिया रसायनों का इस्तेमाल करती हैं।
- विशेषज्ञों ने मांग की है कि सभी राज्य ड्रग कंट्रोलर को सशक्त किया जाए और केंद्रीय निगरानी प्रणाली बनाई जाए।
निष्कर्ष
यह मामला केवल कफ सिरप से हुई मौतों का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र की विफलता का प्रतीक है।
अगर सुप्रीम कोर्ट इस पर सख्त रुख अपनाता है, तो यह दवा उद्योग में जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम होगा।
देशभर में बढ़ती दवा मिलावट और नियामक लापरवाही को रोकने के लिए यह जांच निर्णायक साबित हो सकती है।
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