
नेपाल इन दिनों बड़े राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। हाल ही में काठमांडू और कई अन्य इलाकों से जो घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने भारत और नेपाल दोनों देशों में चिंता बढ़ा दी है। खासकर Nepal News Today की सबसे बड़ी हेडलाइन यह रही कि रिपोर्टिंग कर रहे भारतीय पत्रकारों के साथ मारपीट की गई। शुक्रवार को रिपब्लिक न्यूज चैनल के पत्रकार राघवेंद्र पांडेय को रिपोर्टिंग के दौरान थप्पड़ मारा गया, वहीं IANS एजेंसी के कैमरा पर्सन मान पंकज के साथ भी बदसलूकी की गई।
यह पहली बार नहीं है जब इस आंदोलन के दौरान भारतीय पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार हुआ हो। इससे पहले गुरुवार को एक महिला पत्रकार को रिपोर्टिंग से रोक दिया गया था और सरेआम उनके साथ बदतमीजी की गई थी। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि भारतीय मीडिया उनके आंदोलन को गलत तरीके से दिखा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नेपाल में आखिर स्थिति किस ओर जा रही है।
नेपाल में राजनीतिक संकट और आंदोलन की वजह
नेपाल में पिछले कुछ हफ्तों से Gen-Z आंदोलन तेज़ हो गया है। यह आंदोलन मौजूदा संविधान और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहा है। राष्ट्रपति भवन के बाहर कुलमन घीसिंग और हरका सम्पांग समर्थक आपस में भिड़ गए। इस हिंसा में अब तक 51 लोगों की मौत हो चुकी है और 1500 से ज्यादा लोग घायल हो चुके हैं।
Nepal News Today यही बताता है कि हालात धीरे-धीरे नियंत्रण से बाहर जाते दिख रहे हैं। सेना को सड़कों पर उतारना पड़ा है और काठमांडू में लगातार गश्त की जा रही है।
पत्रकारों पर हमला क्यों?

नेपाल में भारतीय पत्रकारों पर हो रहे हमलों की वजह यह बताई जा रही है कि प्रदर्शनकारी भारतीय मीडिया को पक्षपाती मान रहे हैं। उनका आरोप है कि भारत की मीडिया आंदोलन को गलत ढंग से पेश कर रही है और सरकार के पक्ष में खबरें दिखा रही है।
- शुक्रवार को राघवेंद्र पांडेय और मान पंकज के साथ जो हुआ, उसने भारत में भी गुस्सा भड़का दिया है।
- गुरुवार को महिला पत्रकार के साथ हुई बदतमीजी ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं।
- यह घटनाएं बताती हैं कि आंदोलन में पत्रकारिता करना कितना मुश्किल हो गया है।
नेपाल के 10 बड़े अपडेट्स (शुक्रवार तक)
- सुशीला कार्की को अंतरिम पीएम बनाने पर बातचीत अंतिम चरण में है। उन्हें काठमांडू के मेयर बालेन शाह का समर्थन मिला है।
- कुलमन घीसिंग का नाम भी पीएम पद के लिए प्रस्तावित किया गया, लेकिन सहमति नहीं बन पाई।
- सेना और Gen-Z नेताओं के बीच दूसरा दौर की बैठक जारी है। संसद भंग करने पर चर्चा हो रही है।
- काठमांडू में हालात सामान्य होने लगे हैं, दुकानें खुली हैं और मलबा हटाया जा रहा है।
- भारत ने विशेष उड़ानों से नागरिकों को निकालना शुरू किया। आंध्र प्रदेश के 140 लोग सुरक्षित लौटे।
- सोनौली और पानीटंकी बॉर्डर से भारतीय नागरिक नेपाल छोड़ रहे हैं।
- दिल्ली-काठमांडू बस नेपाल में फंसी हुई है, जबकि अयोध्या के 8 लोग हिलसा में अटके हैं।
- भारतीय वॉलीबॉल टीम को दूतावास ने बचाया। उपासना गिल की वीडियो अपील वायरल हुई थी।
- एसएसबी ने नेपाल की जेल से भागे 67 कैदियों को भारत में घुसने से रोका।
- गाजियाबाद के कारोबारी राजेश गोला की होटल आगजनी में मौत, होटल कारोबार 50% गिरा।
भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर चिंता
भारत सरकार ने नेपाल में फंसे अपने नागरिकों को निकालने के लिए विशेष फ्लाइट्स चलाई हैं। कई लोग सड़क मार्ग से भी लौट रहे हैं। Nepal News Today के अनुसार, अब तक हजारों भारतीय सुरक्षित घर लौट चुके हैं।
भारतीय दूतावास लगातार अलर्ट जारी कर रहा है और नागरिकों से भीड़भाड़ वाले इलाकों से दूर रहने की अपील की है।
अंतरिम प्रधानमंत्री पर असहमति

48 घंटे बीत जाने के बाद भी नेपाल में अंतरिम प्रधानमंत्री तय नहीं हो सका है। माना जा रहा है कि सुशीला कार्की का नाम लगभग तय है, लेकिन संसद भंग करने को लेकर विवाद जारी है। राष्ट्रपति पौडेल संसद भंग करने को तैयार नहीं हैं, जबकि कार्की का कहना है कि गैर-सांसद को पीएम बनाने के लिए संसद को भंग करना जरूरी है।
आपातकाल की आशंका
अगर जल्द ही कोई समाधान नहीं निकला तो नेपाल में आपातकाल लागू किया जा सकता है। सेना ने इसके लिए राष्ट्रपति को प्रस्ताव भेजा है। हालांकि राष्ट्रपति चाहते हैं कि संविधान के दायरे में ही हल निकले।
मीडिया की आज़ादी पर सवाल
भारतीय पत्रकारों के साथ मारपीट की घटनाओं ने प्रेस की स्वतंत्रता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। पत्रकारों का कहना है कि वे केवल सच्चाई दिखा रहे हैं, लेकिन आंदोलनकारियों का मानना है कि भारतीय मीडिया उनकी आवाज़ दबा रही है।
Nepal News Today का यह पहलू साफ दिखाता है कि जब आंदोलन और हिंसा बढ़ती है तो सबसे पहले निशाना मीडिया बनता है।
निष्कर्ष
नेपाल में हालात अभी भी अस्थिर हैं। अंतरिम प्रधानमंत्री पर फैसला अटका हुआ है, आंदोलन जारी है और हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही। भारतीय पत्रकारों और नागरिकों की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बन गई है।
फिलहाल दुनिया की नजरें काठमांडू पर टिकी हैं। यह देखना होगा कि नेपाल अपनी राजनीति और आंदोलन को शांतिपूर्ण रास्ते पर ले जा पाता है या फिर हालात और बिगड़ेंगे।
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