पैकेज्ड फूड खरीदने से पहले अब पैकेट के आगे ही मिलेगी बड़ी चेतावनी?

आजकल बाजार में पैकेज्ड फूड की एक बड़ी रेंज मौजूद है. चिप्स, नमकीन, बिस्किट, इंस्टेंट नूडल्स, मीठे पेय और कई दूसरे खाद्य उत्पाद हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन इन उत्पादों को खरीदते समय ज्यादातर लोग पैकेट के पीछे लिखी लंबी न्यूट्रिशन और इंग्रीडिएंट लिस्ट को ध्यान से नहीं पढ़ते. कई बार जानकारी इतनी बारीक होती है कि आम उपभोक्ता के लिए यह समझना भी आसान नहीं होता कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या फैट कितनी मात्रा में मौजूद है.
इसी समस्या को देखते हुए फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल की व्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में भी पैकेज्ड फूड पर शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट के स्तर को स्पष्ट करने वाले फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल से जुड़ा मामला दर्ज है.
क्या है फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल?
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल का सीधा मतलब है कि किसी खाद्य उत्पाद की महत्वपूर्ण पोषण संबंधी जानकारी पैकेट के सामने वाले हिस्से पर ही स्पष्ट रूप से दिखाई दे. इसका उद्देश्य यह है कि ग्राहक को खरीदारी के समय पैकेट को पलटकर छोटी-छोटी लिखावट में पोषण संबंधी जानकारी खोजने की जरूरत न पड़े. FSSAI पहले भी फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग की दिशा में प्रस्ताव और नियमों पर काम कर चुका है. 2019 में FSSAI की ओर से जारी जानकारी में हाई फैट, हाई शुगर और हाई सॉल्ट वाले पैकेज्ड फूड के लिए फ्रंट-ऑफ-पैक पर लाल रंग की पहचान/कलर कोडिंग का प्रस्ताव भी रखा गया था.
लाल रंग की चेतावनी क्यों महत्वपूर्ण होगी?
अगर किसी उत्पाद के सामने स्पष्ट चेतावनी दिखाई देती है, तो ग्राहक को पहली नजर में यह संकेत मिल सकता है कि उसमें कुछ पोषक तत्व तय सीमा से अधिक हो सकते हैं. ऐसा लेबल उपभोक्ता को डराने के बजाय जानकारी देकर बेहतर विकल्प चुनने में मदद करने का काम कर सकता है.
उदाहरण के तौर पर, अगर कोई व्यक्ति दो अलग-अलग स्नैक पैकेट खरीदने के बारे में सोच रहा है और एक पैकेट पर हाई शुगर या हाई सॉल्ट की स्पष्ट चेतावनी दिखाई देती है, तो वह पोषण संबंधी जानकारी की तुलना करके अपना विकल्प तय कर सकता है.
सिर्फ पीछे की इंग्रीडिएंट लिस्ट क्यों काफी नहीं?
पैकेट के पीछे आमतौर पर कई तरह की जानकारी होती है. इसमें सामग्री, पोषण संबंधी आंकड़े, सर्विंग साइज, ऊर्जा, फैट, कार्बोहाइड्रेट, शुगर और सोडियम जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं. समस्या यह है कि सभी ग्राहक इन आंकड़ों को आसानी से समझ नहीं पाते. इसके अलावा, खरीदारी के दौरान लोग अक्सर जल्दी में होते हैं. ऐसे में पैकेट के सामने एक स्पष्ट चेतावनी उन्हें महत्वपूर्ण जानकारी तुरंत समझने में मदद कर सकती है. यही फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का मूल उद्देश्य है—जानकारी को अधिक स्पष्ट और उपभोक्ता के लिए आसान बनाना.
किन लोगों के लिए हो सकता है ज्यादा उपयोगी?
ऐसी लेबलिंग व्यवस्था आम उपभोक्ताओं के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों के लिए इसका महत्व और बढ़ जाता है. जो लोग अपने खाने में नमक, चीनी या सैचुरेटेड फैट की मात्रा पर विशेष ध्यान देते हैं, वे पैकेट पर मौजूद स्पष्ट चेतावनी देखकर खरीदारी का फैसला ज्यादा आसानी से कर सकते हैं. इसी तरह माता-पिता भी बच्चों के लिए पैकेज्ड स्नैक्स और पेय खरीदते समय पोषण संबंधी जानकारी पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं.
हालांकि, किसी व्यक्ति को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या हृदय संबंधी बीमारी है तो केवल पैकेट पर लगे लेबल के आधार पर डाइट तय नहीं करनी चाहिए. ऐसी स्थिति में डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह अधिक महत्वपूर्ण है.
क्या इसका मतलब पैकेट वाला खाना पूरी तरह बंद करना होगा?
फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल का उद्देश्य किसी खाद्य उत्पाद को पूरी तरह प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि उपभोक्ता को उसकी पोषण संबंधी विशेषताओं के बारे में अधिक स्पष्ट जानकारी देना है. किसी पैकेट पर चेतावनी होने का मतलब यह नहीं है कि उसे खाने से तुरंत बीमारी हो जाएगी. इसका अर्थ यह है कि उसमें संबंधित पोषक तत्व की मात्रा ऐसी हो सकती है जिस पर उपभोक्ता को ध्यान देना चाहिए. स्वस्थ खानपान का आधार कुल डाइट, मात्रा, भोजन की आवृत्ति और व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वास्थ्य जरूरतों पर निर्भर करता है.
बच्चों की सेहत के लिए क्यों अहम है यह मुद्दा?
बच्चों और किशोरों में पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय और दूसरे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की लोकप्रियता बढ़ी है. ऐसे में माता-पिता के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि बच्चे जो उत्पाद खा रहे हैं, उनमें चीनी, नमक और फैट की मात्रा कितनी है. अगर पैकेट के सामने ही महत्वपूर्ण चेतावनी स्पष्ट दिखाई देती है तो खरीदारी के समय फैसला लेना आसान हो सकता है.
हालांकि, बच्चों की डाइट में सिर्फ लेबल देखकर किसी एक खाद्य पदार्थ को पूरी तरह शामिल या बाहर करने के बजाय संतुलित भोजन, फल-सब्जियां, पर्याप्त प्रोटीन और नियमित शारीरिक गतिविधि पर भी ध्यान देना जरूरी है.
कंपनियों के लिए भी बदल सकता है दबाव
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का असर सिर्फ ग्राहकों तक सीमित नहीं रह सकता. अगर उपभोक्ता हाई शुगर, हाई सॉल्ट या हाई फैट वाले उत्पादों को लेकर ज्यादा जागरूक होते हैं, तो खाद्य कंपनियों पर भी अपने उत्पादों की पोषण संरचना में सुधार करने का दबाव बढ़ सकता है. लंबी अवधि में कंपनियां कम चीनी, कम नमक या बेहतर पोषण प्रोफाइल वाले विकल्प विकसित करने पर ज्यादा ध्यान दे सकती हैं. इस तरह लेबलिंग व्यवस्था उपभोक्ता के साथ-साथ खाद्य उद्योग के लिए भी बदलाव का कारण बन सकती है.
FSSAI का क्या उद्देश्य है?
FSSAI यानी Food Safety and Standards Authority of India देश में खाद्य सुरक्षा और मानकों से जुड़ी प्रमुख वैधानिक संस्था है. फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को लेकर FSSAI की पहले की पहल का उद्देश्य भी उपभोक्ताओं को खाद्य उत्पादों की संरचना और पोषण संबंधी जानकारी के आधार पर अधिक सूचित विकल्प चुनने में मदद करना रहा है. हालिया न्यायिक कार्यवाही में भी पैकेज्ड फूड पर शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट के स्पष्ट चेतावनी लेबल की मांग से जुड़ा मुद्दा सामने आया है.
