एक मां की आखिरी चीख, एक परिवार का दर्द और अस्पताल प्रशासन पर गंभीर सवाल…

एक तरफ एक मां की आखिरी चीखें जो सोशल मीडिया पर सिस्टम को झकझोर रही हैं, और दूसरी तरफ एक डॉक्टर की वो दलील जो तनाव और मेडिकल रिस्क की बात कह रही है। मध्य प्रदेश के रीवा से आई यह कहानी सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं है, बल्कि यह कहानी है व्यवस्था, उम्मीद, दर्द और एक गहरे विवाद की। आखिर 26 अगस्त की उस रात रीवा के गांधी मेमोरियल अस्पताल में क्या हुआ था, जिसने एक हंसते-खेलते परिवार को कभी न भूलने वाला जख्म दे दिया?
कहानी की शुरुआत होती है 25 साल की कल्पना मिश्रा से, जो अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत अहसास—एक बच्चे को जन्म देने अस्पताल पहुंची थीं। लेकिन ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले का उनका एक वीडियो सामने आया। वीडियो में कल्पना दर्द साफ़ दिख रहा था, वे डर से चीख रही थीं।
उनका आरोप था कि डॉक्टर और स्टाफ उन पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। परिजन कहते हैं कि उन्होंने बार-बार डॉक्टरों से गुहार लगाई। लेकिन ऑपरेशन के बाद जो खबर आई, उसने परिवार की दुनिया उजाड़ दी। कल्पना और उनके नवजात शिशु, दोनों की मौत हो चुकी थी। परिजनों का सीधा और गंभीर आरोप है कि यह मौत नहीं, बल्कि डॉक्टरों की घोर लापरवाही और अत्यधिक एनेस्थीसिया देने का नतीजा है। एक झटके में एक परिवार ने अपनी बेटी और आने वाले कल को खो दिया।
इस दर्दनाक हादसे के बाद जब गुस्साए परिजन न्याय की मांग लेकर अस्पताल के अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा के पास पहुंचे, तो वहां एक नया विवाद खड़ा हो गया। डॉक्टर ने कहा, इतनी चिंता थी तो 22 साल की उम्र में प्रेग्नेंट क्यों कराया? इस बयान ने आग में घी का काम किया। लेकिन इस पर डॉ. राहुल मिश्रा ने अपना बचाव करते हुए कहा कि उनके बयान को गलत संदर्भ में लिया गया। उनका इरादा किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। वे परिजनों को एक मेडिकल फैक्ट समझा रहे थे कि 18 से 22 साल की उम्र में पहली डिलीवरी बेहद जोखिम भरी यानी हाई-रिस्क होती है। डॉक्टर ने यह भी सवाल उठाया कि जब सरकार 8-8 मुफ्त जांचें और दवाइयां दे रही है, तो गर्भधारण के दौरान महिला की सेहत का ठीक से ध्यान क्यों नहीं रखा गया? साथ ही, उन्होंने अपनी स्थिति बताते हुए कहा कि वे खुद एक रात पहले से जगे हुए थे और अस्पताल में लगातार हो रहे हंगामे के कारण भारी मानसिक तनाव में थे, जिसके कारण संवाद में यह स्थिति बनी।
इस मामले में शामिल अन्य डॉक्टरों का पक्ष भी देखना जरूरी है। ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों का कहना है कि वे उस वक्त दूसरे गंभीर मरीजों और सी-सेक्शन के केसेस को संभाल रहे थे, जिसके कारण डॉक्टरों को पहुंचने में थोड़ी देर हुई। मेडिकल साइंस में कई बार परिस्थितियां अचानक इतनी Complicated हो जाती हैं कि डॉक्टरों के लाख प्रयासों के बाद भी मरीज को बचा पाना नामुमकिन हो जाता है।
उनके मुताबिक, यह जानबूझकर की गई लापरवाही नहीं बल्कि एक मेडिकल इमरजेंसी का दुखद अंत था।
इस पूरी घटना के बाद सरकार और प्रशासन एक्शन में है। उप-मुख्यमंत्री के निर्देश पर जांच कमेटी बनाई गई है और शुरुआती कदम के तौर पर दो डॉक्टरों और दो नर्सों को निलंबित कर दिया गया है।
लेकिन इस घटना ने यह सवाल जरूर छोड़ दिया है कि क्या हमारे मेडिकल सिस्टम में मरीजों के प्रति थोड़ी और संवेदनशीलता की गुंजाइश है? और क्या तनाव में आकर किसी पीड़ित परिवार से इस तरह की बात कहना जायज है? सच्चाई क्या है, यह तो पूरी निष्पक्ष जांच के बाद ही साफ होगा। लेकिन इस दुखद घड़ी में हमारी संवेदनाएं पीड़ित परिवार के साथ हैं। आप इस पूरी घटनाक्रम और अस्पताल प्रशासन के रवैये को किस तरह देखते हैं? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
