ईद मिलादुन्नबी को लेकर मुस्लिम समुदाय में अलग-अलग मान्यताएं हैं। आखिर सलफी और देवबंदी इसे क्यों नहीं मनाते?

इस्लामी कैलेंडर के रबीउल अव्वल महीने में पैगंबर मोहम्मद साहब की पैदाइश और उनके जीवन से जुड़ी यादों को लेकर दुनिया भर के मुसलमानों में अलग-अलग धार्मिक परंपराएं देखने को मिलती हैं। भारत समेत कई देशों में बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग ईद मिलादुन्नबी के मौके पर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
वहीं, मुस्लिम समुदाय के भीतर ही कुछ विचारधाराएं ऐसी हैं जो इस मौके पर जश्न या विशेष आयोजन को धार्मिक रूप से उचित नहीं मानतीं। इनमें सलफी और देवबंदी विचारधारा के अनुयायी शामिल हैं। इसके पीछे मुख्य वजह बिदअत, यानी धर्म में बाद में जोड़ी गई नई धार्मिक प्रथा को लेकर उनकी विशेष धार्मिक व्याख्या है। हालांकि, इस मुद्दे पर मुस्लिम विद्वानों के बीच अलग-अलग मत हैं और इसे समझने के लिए विभिन्न इस्लामी विचारधाराओं के नजरिए को अलग-अलग देखना जरूरी है।
ईद मिलादुन्नबी क्या है?
ईद मिलादुन्नबी को पैगंबर मोहम्मद साहब की पैदाइश की याद में मनाया जाने वाला अवसर माना जाता है। भारत के कई हिस्सों सहित दुनिया के अलग-अलग देशों में इस मौके पर धार्मिक सभाएं, नात, दुआ और अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कुछ समुदाय इस दिन पैगंबर मोहम्मद साहब की शिक्षाओं, उनके जीवन और उनके संदेश को याद करते हैं। कई जगहों पर जुलूस और सार्वजनिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। हालांकि, सभी मुस्लिम समुदाय इस दिन को एक समान तरीके से नहीं मनाते और कुछ विचारधाराएं इसे धार्मिक त्योहार के रूप में मनाने का समर्थन नहीं करतीं।
देवबंदी और सलफी विचारधारा का क्या मानना है?
देवबंदी और सलफी विद्वानों की धार्मिक व्याख्या में कुरान और पैगंबर मोहम्मद साहब की सुन्नत के साथ शुरुआती मुस्लिम समुदाय की प्रथाओं को विशेष महत्व दिया जाता है। इन विचारधाराओं से जुड़े कई विद्वानों का तर्क है कि पैगंबर मोहम्मद साहब ने अपने जन्मदिन को किसी विशेष वार्षिक धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं मनाया। उनके बाद सहाबा और शुरुआती मुस्लिम पीढ़ियों से भी ऐसी परंपरा का स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलता। इसी आधार पर वे ईद मिलादुन्नबी को धार्मिक त्योहार के रूप में मनाने को उचित नहीं मानते।
बिदअत क्या है?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए बिदअत शब्द को समझना जरूरी है। सामान्य तौर पर बिदअत का अर्थ धर्म में ऐसी नई धार्मिक प्रथा से है, जिसे शुरुआती इस्लामी परंपरा में धार्मिक तौर पर निर्धारित या प्रचलित नहीं माना जाता।
सलफी और देवबंदी विचारधारा के कई विद्वान धार्मिक इबादत और त्योहारों के मामले में शुरुआती इस्लामी परंपरा का पालन करने पर जोर देते हैं। इसलिए उनके अनुसार किसी नए धार्मिक आयोजन को नियमित धार्मिक उत्सव का रूप देना उचित नहीं है।
यही तर्क ईद मिलादुन्नबी को लेकर उनके विरोध का एक प्रमुख आधार है।
क्या सलफी और देवबंदी पैगंबर से प्रेम नहीं करते?
यह समझना जरूरी है कि ईद मिलादुन्नबी न मनाने का अर्थ पैगंबर मोहम्मद साहब के प्रति सम्मान या प्रेम न होना नहीं है।
देवबंदी और सलफी विचारधारा के अनुयायी भी पैगंबर मोहम्मद साहब को इस्लाम का पैगंबर मानते हैं और उनकी शिक्षाओं व सुन्नत का पालन करने को महत्वपूर्ण समझते हैं। उनका मत केवल इस बात को लेकर है कि पैगंबर की पैदाइश के मौके पर एक विशेष वार्षिक धार्मिक उत्सव मनाने की परंपरा इस्लाम की शुरुआती धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा थी या नहीं।
इसलिए इस विषय पर चर्चा करते समय अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं को समझना जरूरी है।
बरेलवी विचारधारा का क्या है नजरिया?
ईद मिलादुन्नबी को लेकर बरेलवी विचारधारा का नजरिया अलग है। इस विचारधारा से जुड़े कई विद्वान पैगंबर मोहम्मद साहब की पैदाइश को खुशी और शुक्र का अवसर मानते हैं।
उनका तर्क है कि पैगंबर मोहम्मद साहब के जीवन, शिक्षाओं और उनकी पैदाइश को याद करना उनके प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त करने का माध्यम हो सकता है। इस नजरिए के अनुसार, अगर किसी आयोजन में इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ कोई बात न हो, तो पैगंबर की सीरत और उनकी शिक्षाओं को याद करना धार्मिक रूप से स्वीकार्य माना जा सकता है।
इसी कारण भारत के कई हिस्सों में बरेलवी समुदाय से जुड़े लोग ईद मिलादुन्नबी पर विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
क्या यह विवाद सिर्फ ईद मिलादुन्नबी तक सीमित है?
देवबंदी और बरेलवी विचारधाराओं के बीच कई धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर मतभेद रहे हैं। इन मतभेदों की जड़ें 19वीं सदी के भारत में विकसित हुई अलग-अलग धार्मिक सुधार और व्याख्यात्मक परंपराओं तक जाती हैं। दारुल उलूम देवबंद की स्थापना 1866 में हुई थी, जबकि बरेली से जुड़ी धार्मिक परंपरा में अहमद रजा खान बरेलवी का प्रभाव रहा। समय के साथ दोनों धाराओं के विद्वानों के बीच कई धार्मिक विषयों पर अलग-अलग विचार सामने आए। ईद मिलादुन्नबी को लेकर मतभेद भी इन्हीं व्यापक धार्मिक मतभेदों का एक हिस्सा है।
अक्सर आम बातचीत में सलफी, वहाबी और देवबंदी को एक ही विचारधारा के रूप में बताया जाता है, लेकिन यह पूरी तरह सटीक नहीं है।देवबंदी और सलफी परंपराओं में कुछ धार्मिक मुद्दों पर समानताएं हो सकती हैं, खासकर धार्मिक प्रथाओं में शुरुआती इस्लामी स्रोतों और सुन्नत को महत्व देने के मामले में। लेकिन दोनों की अपनी अलग ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विद्वत परंपराएं हैं। इसलिए किसी पूरे समुदाय या विचारधारा को एक ही नाम से संबोधित करने के बजाय उनके अलग-अलग धार्मिक संदर्भ को समझना अधिक उचित है।
क्या सभी मुस्लिम देशों में ईद मिलादुन्नबी मनाई जाती है?
दुनिया के अलग-अलग मुस्लिम समाजों में ईद मिलादुन्नबी को लेकर परंपराएं अलग हैं। कुछ देशों और समुदायों में इसे सार्वजनिक रूप से बड़े स्तर पर मनाया जाता है, जबकि कुछ जगहों पर इसे धार्मिक त्योहार के रूप में नहीं मनाया जाता। इसका कारण मुस्लिम समुदायों में मौजूद अलग-अलग धार्मिक विचारधाराएं और स्थानीय धार्मिक परंपराएं हैं। इसलिए किसी एक देश या समुदाय की परंपरा को पूरी दुनिया के मुसलमानों पर लागू करना उचित नहीं होगा।
ईद मिलादुन्नबी को लेकर विवाद मूल रूप से धार्मिक व्याख्या का विषय है। एक पक्ष पैगंबर मोहम्मद साहब की पैदाइश को याद करने और उनके प्रति प्रेम व्यक्त करने के लिए विशेष आयोजन को उचित मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इस तरह के वार्षिक धार्मिक आयोजन को शुरुआती इस्लामी परंपरा में निर्धारित न होने के कारण स्वीकार नहीं करता।
दोनों पक्ष अपने-अपने धार्मिक तर्क और विद्वानों की व्याख्याओं का हवाला देते हैं। इसलिए इस विषय पर बात करते समय किसी समुदाय के प्रति आपत्तिजनक या अपमानजनक भाषा के बजाय उसके धार्मिक दृष्टिकोण को समझना जरूरी है।
Disclaimer: यह लेख विभिन्न मुस्लिम विचारधाराओं में प्रचलित धार्मिक दृष्टिकोणों को सामान्य जानकारी के रूप में समझाने के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी विचारधारा के सभी अनुयायी बिल्कुल एक जैसा मत रखते हों, यह जरूरी नहीं है। धार्मिक मामलों में अंतिम राय के लिए संबंधित मान्य धार्मिक विद्वानों से सलाह लेना उचित है।
