☀️ धरती पर 'सूरज' बनाने की रेस में भारत! बेंगलुरु के PRAGYA टोकामक ने पहली बार प्लाज्मा बनाया। फ्यूजन एनर्जी की दिशा में भारत के प्राइवेट रिसर्च सेक्टर का यह बड़ा कदम माना जा रहा है।

सूरज जैसी ऊर्जा पैदा करने की इंसानी कोशिश अब एक और कदम आगे बढ़ गई है। भारत में निजी क्षेत्र ने फ्यूजन रिसर्च की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। बेंगलुरु स्थित PRAGYA टोकामक ने पहली बार प्लाज्मा पैदा करके देश के प्राइवेट फ्यूजन रिसर्च क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शुरुआत की है।
क्या है PRAGYA टोकामक……?
PRAGYA एक टोकामक आधारित फ्यूजन रिसर्च सिस्टम है। टोकामक ऐसी मशीन होती है जिसमें बेहद गर्म प्लाज्मा को शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की मदद से नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। सूरज और दूसरे तारों में ऊर्जा का स्रोत न्यूक्लियर फ्यूजन है। इसमें हल्के परमाणु आपस में जुड़कर भारी परमाणु बनाते हैं और इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। वैज्ञानिक इसी प्रक्रिया को धरती पर नियंत्रित तरीके से हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।
पहली बार बना प्लाज्मा क्यों है खास…..?
फ्यूजन रिसर्च में प्लाज्मा बनाना शुरुआती लेकिन बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। इसके बाद वैज्ञानिक प्लाज्मा को ज्यादा तापमान तक पहुंचाने, उसे स्थिर रखने और लंबे समय तक नियंत्रित करने जैसी चुनौतियों पर काम करते हैं। PRAGYA से पहली बार प्लाज्मा का निर्माण भारत में निजी फ्यूजन रिसर्च की संभावनाओं को मजबूत करता है। इसका मतलब यह भी है कि देश में फ्यूजन तकनीक पर काम अब केवल सरकारी और बड़े संस्थागत रिसर्च प्रोग्राम तक सीमित नहीं रह गया है।
धरती पर ‘सूरज’ बनाने की कोशिश क्यों…..?
न्यूक्लियर फ्यूजन को भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा के संभावित स्रोतों में गिना जाता है। अगर वैज्ञानिक फ्यूजन रिएक्शन को नियंत्रित और व्यावहारिक तरीके से इस्तेमाल करने में सफल होते हैं, तो इससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा की जा सकती है। इसी वजह से दुनिया के कई देश फ्यूजन रिसर्च में भारी निवेश कर रहे हैं। लक्ष्य ऐसी तकनीक विकसित करना है जिसमें सूरज की तरह फ्यूजन से ऊर्जा हासिल की जा सके, लेकिन इसे धरती पर सुरक्षित और नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाए।
भारत के लिए क्या मायने…..?
PRAGYA की यह उपलब्धि भारत के फ्यूजन इकोसिस्टम के विस्तार की दिशा में अहम कदम है। निजी कंपनियों और रिसर्च संस्थानों की भागीदारी बढ़ने से इस क्षेत्र में नई तकनीक, इंजीनियरिंग क्षमता और रिसर्च के अवसर विकसित हो सकते हैं। प्लाज्मा बन जाना फ्यूजन से बिजली उत्पादन की मंजिल नहीं है। इसके लिए प्लाज्मा को लंबे समय तक नियंत्रित करना, अत्यधिक तापमान और ऊर्जा से जुड़ी तकनीकी चुनौतियों को हल करना और पूरी प्रक्रिया को आर्थिक रूप से व्यवहारिक बनाना अभी बड़ी चुनौती है। फिर भी बेंगलुरु से आई यह उपलब्धि संकेत देती है कि भारत फ्यूजन ऊर्जा की वैश्विक दौड़ में अपनी भूमिका मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
