चीनी 65 रुपये किलो तक पहुंची, लेकिन गन्ना किसान अब भी परेशान! आखिर महंगी चीनी का फायदा किसानों को क्यों नहीं मिल रहा? जानें पूरी वजह और कब मिल सकती है राहत।

चीनी की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर आम आदमी और गन्ना किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अगस्त 2026 में कई शहरों में चीनी के खुदरा दाम 60-65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। 18 अगस्त को देश में चीनी का औसत खुदरा भाव करीब 52.30 रुपये प्रति किलो था, जबकि एक साल पहले यह 46.34 रुपये प्रति किलो था। थोक बाजार में भी कीमतें 5,530 रुपये प्रति क्विंटल के करीब पहुंच गई हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि चीनी के दाम बढ़ने के बावजूद गन्ना किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। किसानों का करीब 16,087 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बकाया बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि चीनी की महंगाई का फायदा आखिर किसे मिल रहा है?
चीनी के दाम अचानक क्यों बढ़े….?
चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण मांग और उपलब्ध आपूर्ति के बीच बढ़ता अंतर माना जा रहा है।
1. E20 इथेनॉल नीति का असर :-
पेट्रोल में 20 फीसदी तक इथेनॉल मिलाने के लक्ष्य के चलते गन्ने के एक हिस्से का इस्तेमाल चीनी बनाने के बजाय इथेनॉल उत्पादन में किया जा रहा है। इससे बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 25 लाख टन चीनी उत्पादन के बराबर गन्ने को इथेनॉल की ओर डायवर्ट किए जाने का दावा किया गया है।
2. मानसून की कमी :-
इस साल मानसून की स्थिति भी चिंता का विषय रही है। बारिश में कमी का असर गन्ने की पैदावार पर पड़ सकता है। उत्पादन घटने की आशंका के चलते बाजार में भविष्य की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है।
3. चीनी का घटता स्टॉक :-
नए चीनी सीजन की शुरुआत में उपलब्ध शुरुआती स्टॉक को लेकर भी अलग-अलग अनुमान सामने आ रहे हैं। कुछ अनुमानों में यह 32-35 लाख टन और कुछ में 40-42 लाख टन के आसपास रहने की बात कही जा रही है। वहीं देश की सालाना खपत इससे काफी अधिक है।
4. त्योहारी सीजन में मांग :-
गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान चीनी की मांग तेजी से बढ़ती है। घरों के अलावा मिठाई, बिस्कुट, पेय पदार्थ और कन्फेक्शनरी उद्योग में भी खपत बढ़ जाती है। इससे कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।
5. निर्यात पर रोक के बाद भी राहत नहीं :-
सरकार ने चीनी के निर्यात पर रोक लगाई है, लेकिन इसके बावजूद कीमतों में तेजी बनी हुई है। सरकार ने स्टॉक लिमिट और बाजार निगरानी जैसे कदम भी उठाए हैं, ताकि जमाखोरी और सट्टेबाजी पर नियंत्रण किया जा सके।
सरकार ने चीनी सस्ती करने के लिए क्या किया…..?
बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह कदम करीब एक दशक बाद इतनी बड़ी मात्रा में शुल्क-मुक्त आयात के रूप में सामने आया है। इसके अलावा बल्क उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक रखने की सीमा भी सख्त की गई है। मिठाई निर्माता, पेय पदार्थ कंपनियां और फूड प्रोसेसिंग उद्योग जैसे बड़े उपभोक्ताओं पर स्टॉक को लेकर निगरानी बढ़ाई जा रही है। सरकार ने चीनी के निर्यात पर भी रोक जारी रखी है और चीनी मिलों से बिक्री एवं लेन-देन की जानकारी मांगी है, ताकि बाजार में किसी तरह की कृत्रिम कमी पैदा न हो।
चीनी महंगी है तो किसान को फायदा क्यों नहीं…..?
यही इस पूरे संकट का सबसे बड़ा सवाल है। चीनी का खुदरा दाम बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि किसान को गन्ने का पैसा उसी अनुपात में मिल रहा है। चीनी मिल और किसान के बीच भुगतान व्यवस्था अलग है। मिलों की वित्तीय स्थिति, उत्पादन लागत और बकाया भुगतान के कारण किसानों को समय पर पैसा नहीं मिल पा रहा है। 16 फरवरी 2026 तक देश में गन्ना किसानों का करीब 16,087 करोड़ रुपयेबकाया बताया गया था। महाराष्ट्र में यह बकाया करीब 4,898 करोड़ रुपये था। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब और दूसरे राज्यों में भी किसानों के भुगतान को लेकर समस्या बनी हुई है। यानी बाजार में चीनी महंगी बिक रही है, लेकिन किसान अपने गन्ने के पुराने भुगतान का इंतजार कर रहा है। यही वजह है कि चीनी की महंगाई का सीधा लाभ किसान की जेब तक नहीं पहुंच पा रहा।
क्या शुल्क-मुक्त आयात से चीनी सस्ती होगी…..?
सरकार के 10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात के फैसले से बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति आने की उम्मीद है। इससे आने वाले हफ्तों में कीमतों पर कुछ दबाव कम हो सकता है। इसका असर तुरंत दिखाई देना जरूरी नहीं है। आयातित कच्ची चीनी को रिफाइन कर बाजार तक पहुंचने में समय लगेगा। इसके अलावा त्योहारों के दौरान मांग ज्यादा रहने वाली है। विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, आने वाले समय में खुदरा कीमतों में कुछ नरमी आ सकती है और चीनी करीब 50-55 रुपये प्रति किलो के आसपास आ सकती है। हालांकि पुराने दौर की 45-46 रुपये किलो वाली कीमतें तुरंत लौटने की संभावना कम है।
किसानों के लिए असली समाधान क्या है…..?
चीनी की कीमतों को नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन इसके साथ किसानों के बकाया भुगतान का समाधान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब तक मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत नहीं होगी और किसानों को समय पर गन्ने का भुगतान नहीं मिलेगा, तब तक बाजार में चीनी महंगी होने का फायदा किसान को नहीं मिल पाएगा। सरकार के सामने एक तरफ आम आदमी के लिए चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ किसानों को उचित और समय पर भुगतान दिलाने की जिम्मेदारी भी है। साथ ही E20 नीति के तहत इथेनॉल उत्पादन और घरेलू चीनी उपलब्धता के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है।
आम आदमी को कब मिलेगी राहत…..?
अगले कुछ हफ्ते चीनी की कीमतों के लिहाज से अहम रहने वाले हैं। शुल्क-मुक्त आयात से बाजार में सप्लाई बढ़ने पर कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन त्योहारी मांग, कम स्टॉक और इथेनॉल डायवर्जन जैसी वजहों से बहुत बड़ी गिरावट की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। फिलहाल सबसे बड़ी विडंबना यही है कि चीनी महंगी है, लेकिन गन्ना किसान अब भी अपने बकाये के लिए संघर्ष कर रहा है। अगर सरकार की आयात नीति, स्टॉक लिमिट और इथेनॉल डायवर्जन में बदलाव से चीनी की उपलब्धता बढ़ती है और मिलों का कैश फ्लो सुधरता है, तो इसका फायदा किसानों के लंबित भुगतान में भी मिल सकता है।
