नेपाल जैसी तबाही का खतरा भारत में भी?

नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान हिमालय की संवेदनशीलता की ओर खींचा है. अचानक आने वाली बाढ़, ग्लेशियर झील के फटने, भूस्खलन और तेज जलधारा जैसी घटनाएं कुछ ही घंटों में बड़े इलाके में भारी तबाही मचा सकती हैं. नेपाल की घटना के बाद भारत के हिमालयी राज्यों को लेकर भी चर्चा तेज हुई है. इनमें उत्तराखंड खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य का बड़ा हिस्सा ऊंचे पहाड़ों, ग्लेशियरों, नदियों और भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों में आता है. हालांकि किसी विशेष घटना की भविष्यवाणी पहले से निश्चित रूप से नहीं की जा सकती, लेकिन वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए ऐसे इलाके लगातार निगरानी के केंद्र में रहते हैं.
नेपाल और उत्तराखंड में क्या समानता है?
नेपाल और उत्तराखंड दोनों हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं. यहां ऊंचे पर्वत, सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्र, ग्लेशियर और तेज बहाव वाली नदियां मौजूद हैं. हिमालय अभी भी भूगर्भीय रूप से सक्रिय पर्वत श्रृंखला है. इसलिए यहां भूकंप, भूस्खलन, ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं और अचानक आने वाली बाढ़ का जोखिम बना रहता है. बारिश के दौरान खतरा और बढ़ सकता है. पहाड़ी ढलानों पर भारी बारिश से मिट्टी और चट्टानों के खिसकने का खतरा रहता है, जबकि ग्लेशियर या ग्लेशियल झीलों से जुड़ी घटनाएं निचले इलाकों में अचानक पानी का बहाव बढ़ा सकती हैं.
उत्तराखंड पहले भी देख चुका है बड़ी तबाही
उत्तराखंड के लिए प्राकृतिक आपदा का खतरा कोई नई बात नहीं है. 2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरे देश को झकझोर दिया था. भारी बारिश, बादल फटने और अचानक आई बाढ़ ने हजारों लोगों की जिंदगी प्रभावित की और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया. इसके बाद 2021 में चमोली जिले में ग्लेशियर से जुड़ी आपदा ने भी गंभीर तबाही मचाई. अचानक आए तेज जलप्रवाह ने नदी घाटी में मौजूद बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाया. इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि हिमालयी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए आपदा से पहले की तैयारी बेहद जरूरी है.
उत्तराखंड में कैसे की जाती है निगरानी?
संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम, नदी के जलस्तर और संभावित आपदा से जुड़े संकेतों पर नजर रखी जाती है. नदियों और जलस्रोतों के जलस्तर में अचानक बदलाव की निगरानी महत्वपूर्ण होती है. इसके अलावा मौसम पूर्वानुमान, भारी बारिश की चेतावनी और भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाई जाती है. कई जगहों पर स्वचालित मौसम केंद्र और अन्य निगरानी उपकरण लगाए गए हैं. इनसे मिलने वाला डेटा आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने में मदद करता है.
अलर्ट मिलते ही लोगों को कैसे दी जाती है जानकारी?
किसी इलाके में अचानक बाढ़ या अन्य खतरे की आशंका होने पर प्रशासन की ओर से स्थानीय स्तर पर चेतावनी जारी की जा सकती है. इसके लिए मोबाइल अलर्ट, सायरन, स्थानीय प्रशासन, पुलिस और अन्य संचार माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है.
पहाड़ी क्षेत्रों में शुरुआती चेतावनी का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि सड़कें बंद होने या भूस्खलन होने की स्थिति में बचाव दल को प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचने में समय लग सकता है. अगर लोगों को समय रहते खतरे की जानकारी मिल जाए तो वे नदी और नालों के किनारे से हटकर सुरक्षित ऊंचाई वाले स्थानों पर जा सकते हैं.
स्थानीय लोग क्यों होते हैं सबसे महत्वपूर्ण?
किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के दौरान बाहरी राहत दलों के पहुंचने से पहले स्थानीय लोग ही सबसे पहले मदद के लिए आगे आते हैं. इसी वजह से उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में स्थानीय युवाओं और समुदायों की आपदा प्रबंधन ट्रेनिंग महत्वपूर्ण मानी जाती है. स्थानीय लोगों को प्राथमिक बचाव, सुरक्षित स्थानों की पहचान, आपातकालीन संचार और जरूरत पड़ने पर लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने जैसी बुनियादी जानकारी दी जा सकती है. कई इलाकों में स्थानीय स्वयंसेवक और प्रशिक्षित समुदाय आपदा के शुरुआती घंटों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
SDRF, NDRF और दूसरी एजेंसियों की भूमिका
उत्तराखंड में आपदा की स्थिति से निपटने के लिए राज्य आपदा प्रतिवादन बल यानी SDRF महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. बड़ी आपदा की स्थिति में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी NDRF और दूसरी केंद्रीय एजेंसियों की मदद भी ली जा सकती है.
इन टीमों के पास राहत और बचाव के लिए विशेष उपकरण होते हैं. कठिन पहाड़ी क्षेत्रों में संचार बनाए रखने के लिए आधुनिक संचार साधनों का इस्तेमाल भी किया जाता है. इसके अलावा सेना और स्थानीय प्रशासन भी जरूरत के अनुसार राहत एवं बचाव अभियान में शामिल हो सकते हैं.
सड़कों और पुलों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती
हिमालयी राज्यों में आपदा का असर सिर्फ लोगों तक सीमित नहीं रहता. सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं, संचार नेटवर्क और दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी प्रभावित हो सकती हैं. भूस्खलन या अचानक आई बाढ़ के कारण सड़कें टूट सकती हैं और गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से कट सकता है. इसीलिए संवेदनशील क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और वैकल्पिक संपर्क मार्ग तैयार रखना आपदा प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है. ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों से जुड़ी घटनाओं का जोखिम वैज्ञानिक निगरानी से समझने की कोशिश की जाती है, लेकिन हर घटना की सटीक तारीख और समय पहले से बताना संभव नहीं है. ग्लेशियल झीलों के आकार, पानी के स्तर, आसपास के ग्लेशियरों और मौसम जैसी परिस्थितियों पर निगरानी रखी जा सकती है. इस तरह की निगरानी का मुख्य उद्देश्य खतरे के संकेत मिलने पर अर्ली वार्निंग देना और लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना है.
हिमालयी इलाकों में रहने या यात्रा करने वाले लोगों के लिए प्रशासन की चेतावनियों को गंभीरता से लेना जरूरी है.
- भारी बारिश के दौरान नदी और नालों के किनारे न जाएं.
- प्रशासन द्वारा जारी चेतावनी और मौसम अपडेट पर नजर रखें.
- अचानक पानी बढ़ने पर नदी के किनारे रुकने के बजाय ऊंचे और सुरक्षित स्थान पर जाएं.
- भूस्खलन संभावित सड़कों पर अनावश्यक यात्रा से बचें.
- आपात स्थिति में स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें.
- परिवार के साथ एक आपातकालीन संपर्क योजना और जरूरी सामान तैयार रखें.
