क्या आप जानते हैं? भारतीय रेलवे में 50 साल तक ट्रेनों में टॉयलेट नहीं होते थे।

आज भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक है। करोड़ों यात्री हर दिन ट्रेनों में सफर करते हैं और टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधा को सामान्य मानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में ट्रेन सेवा शुरू होने के करीब 50 साल तक रेल के डिब्बों में टॉयलेट नहीं हुआ करते थे? यात्रियों को स्टेशन पर उतरकर शौच के लिए जाना पड़ता था और कई बार इसी कारण उनकी ट्रेन भी छूट जाती थी। दिलचस्प बात यह है कि ट्रेनों में शौचालय की शुरुआत किसी सरकारी योजना या बड़े आंदोलन की वजह से नहीं हुई, बल्कि एक यात्री के लिखे गए मजेदार लेकिन गंभीर शिकायत पत्र ने रेलवे प्रशासन को इस समस्या पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। आइए जानते हैं भारतीय रेलवे के इस अनोखे इतिहास के बारे में।
भारत में रेलवे की शुरुआत कब हुई?
भारत में पहली यात्री ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को ब्रिटिश शासन के दौरान मुंबई (तब बॉम्बे) के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के बीच चलाई गई थी। यह यात्रा करीब 34 किलोमीटर लंबी थी और इसी के साथ भारतीय रेलवे की शुरुआत हुई।
इसके बाद देशभर में रेल नेटवर्क तेजी से फैलने लगा, लेकिन शुरुआती दशकों में यात्रियों के लिए कई जरूरी सुविधाओं का अभाव था। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि ट्रेन के डिब्बों में शौचालय नहीं होते थे।
बिना टॉयलेट के कैसे करते थे सफर?
उस दौर में लंबी दूरी की यात्रा करना यात्रियों के लिए बेहद कठिन था। यदि किसी को शौच जाना होता, तो उसे अगले स्टेशन का इंतजार करना पड़ता था। ट्रेन रुकते ही यात्री जल्दबाजी में स्टेशन से बाहर या पटरियों के किनारे किसी सुनसान जगह पर जाते थे। कई बार ट्रेन जल्दी चल पड़ती थी और यात्री पीछे छूट जाते थे। महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए यह परेशानी और भी ज्यादा गंभीर थी।
ओखिल चंद्र सेन की घटना जिसने बदल दिया इतिहास
साल 1909 में पश्चिम बंगाल के रहने वाले ओखिल चंद्र सेन ट्रेन से सफर कर रहे थे। यात्रा के दौरान उनका पेट अचानक खराब हो गया। जब ट्रेन पश्चिम बंगाल के अहमदपुर स्टेशन पर रुकी तो वे शौच के लिए स्टेशन से बाहर चले गए। इसी दौरान गार्ड ने सीटी बजा दी और ट्रेन चलने लगी। ओखिल चंद्र सेन एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ से अपनी धोती संभालते हुए ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़े, लेकिन प्लेटफॉर्म पर गिर पड़े। ट्रेन निकल गई और वहां मौजूद लोगों के सामने उन्हें भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा।
रेलवे को लिखा ऐसा खत, जो इतिहास बन गया
घटना के बाद ओखिल चंद्र सेन ने साहिबगंज रेलवे डिवीजन को एक शिकायत पत्र लिखा। उनका पत्र बेहद रोचक अंदाज में लिखा गया था, लेकिन उसमें यात्रियों की गंभीर समस्या भी साफ झलकती थी। उन्होंने लिखा कि वे शौच के लिए गए थे, लेकिन गार्ड ने कुछ मिनट भी इंतजार नहीं किया। वे लोटा और धोती संभालते हुए दौड़े, गिर पड़े और सार्वजनिक रूप से अपमानित हुए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि गार्ड के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो वे इस मामले को अखबारों तक पहुंचाएंगे।
यह पत्र बाद में भारतीय रेलवे के इतिहास के सबसे चर्चित शिकायत पत्रों में शामिल हो गया।
इसके बाद शुरू हुई ट्रेनों में टॉयलेट की सुविधा
बताया जाता है कि ओखिल चंद्र सेन के पत्र ने रेलवे अधिकारियों का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित किया। इसके बाद 1909 में 50 मील (लगभग 80 किलोमीटर) से अधिक दूरी तय करने वाली ट्रेनों में शौचालय लगाने की शुरुआत की गई।
समय के साथ यह सुविधा अन्य ट्रेनों तक भी पहुंची और धीरे-धीरे भारतीय रेलवे के सभी यात्री डिब्बों में टॉयलेट अनिवार्य सुविधा बन गई।
आज भारतीय रेलवे में आधुनिक टॉयलेट
आज भारतीय रेलवे में यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए लगातार बदलाव किए जा रहे हैं। आधुनिक कोचों में भारतीय और वेस्टर्न दोनों प्रकार के टॉयलेट उपलब्ध हैं। इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण के लिए बायो-टॉयलेट और नई पीढ़ी की ट्रेनों में अधिक स्वच्छ एवं आधुनिक शौचालय लगाए जा रहे हैं।
