जब एक किसान के नाम हो गई थी पूरी ट्रेन!

भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक है और इसकी अधिकांश सेवाएं सरकारी व्यवस्था के तहत संचालित होती हैं. ऐसे में अगर कोई कहे कि एक आम किसान के नाम पर एक पूरी एक्सप्रेस ट्रेन हो गई थी, तो शायद यकीन करना मुश्किल होगा. लेकिन पंजाब में जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़ा एक मामला ऐसा था, जिसने रेलवे और अदालत दोनों को चर्चा में ला दिया. इस मामले में लुधियाना जिले के एक किसान संपूर्ण सिंह ने रेलवे से अपने जमीन के उचित मुआवजे की मांग को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. मामला इतना आगे बढ़ा कि अदालत के आदेश पर लुधियाना रेलवे स्टेशन पर खड़ी अमृतसर स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस को कुर्क करने की कार्रवाई तक करनी पड़ी.
कौन थे संपूर्ण सिंह?
संपूर्ण सिंह पंजाब के लुधियाना जिले के कटाणा गांव के रहने वाले किसान थे. वह किसी बड़े कारोबारी या उद्योगपति की तरह चर्चित नाम नहीं थे. उनकी जमीन रेलवे लाइन के निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई थी. यही जमीन आगे चलकर उनके और रेलवे के बीच लंबे कानूनी विवाद की वजह बनी.
साल 2007 के आसपास लुधियाना से चंडीगढ़ के बीच नई रेलवे लाइन बिछाने की परियोजना पर काम शुरू हुआ. इस परियोजना के लिए रेलवे को कई किसानों की जमीन की आवश्यकता थी. संपूर्ण सिंह की जमीन भी प्रस्तावित रेलवे लाइन के रास्ते में आ रही थी. रेलवे ने उनकी जमीन का अधिग्रहण किया और उन्हें 25 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया गया. शुरुआत में मामला सामान्य जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया जैसा ही था, लेकिन बाद में संपूर्ण सिंह को एक ऐसी जानकारी मिली, जिसने उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर कर दिया.
पड़ोसी गांव में ज्यादा मुआवजे की जानकारी मिली
संपूर्ण सिंह को पता चला कि पास के एक गांव में इसी तरह की जमीन के लिए रेलवे ने किसानों को करीब 71 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया था. उनका तर्क था कि जब जमीन की प्रकृति और परिस्थितियां लगभग समान थीं, तो मुआवजे की राशि में इतना बड़ा अंतर क्यों रखा गया? इसी सवाल को लेकर उन्होंने रेलवे के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की.
2012 में कोर्ट पहुंचे संपूर्ण सिंह
संपूर्ण सिंह ने वर्ष 2012 में अदालत में याचिका दाखिल की. उन्होंने मांग की कि उनकी जमीन के लिए उचित और समान दर से मुआवजा दिया जाए. मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने रेलवे की ओर से निर्धारित मुआवजे की राशि में बदलाव किया. जनवरी 2015 में मुआवजे की दर को 25 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये प्रति एकड़ कर दिया गया. इस फैसले के बाद संपूर्ण सिंह को मिलने वाली कुल राशि करीब 1.47 करोड़ रुपये हो गई.
अदालत ने उत्तर रेलवे को निर्धारित समय के भीतर यह रकम चुकाने का निर्देश भी दिया.
रेलवे ने पूरी रकम नहीं दी तो बढ़ा विवाद
अदालत के आदेश के बाद भी संपूर्ण सिंह को पूरी रकम का भुगतान नहीं हुआ. रिपोर्टों के मुताबिक उन्हें करीब 42 लाख रुपये ही मिले, जबकि बाकी राशि का भुगतान बाकी था. संपूर्ण सिंह ने एक बार फिर अदालत का रुख किया और अदालत को बताया कि आदेश के बावजूद रेलवे ने पूरी रकम का भुगतान नहीं किया है. इसके बाद मामले ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.
कोर्ट ने ट्रेन कुर्क करने का आदेश दिया
संपूर्ण सिंह की बकाया रकम को लेकर अदालत ने सख्त रुख अपनाया. वर्ष 2017 में जिला एवं सत्र न्यायाधीश जसपाल वर्मा ने लुधियाना रेलवे स्टेशन पर खड़ी एक ट्रेन को कुर्क करने का आदेश दिया. यह आदेश रेलवे के लिए असामान्य था, क्योंकि किसी ट्रेन की कुर्की सामान्य परिस्थितियों में बेहद असाधारण कार्रवाई मानी जाती है. अदालत के आदेश के बाद संपूर्ण सिंह अधिकारियों के साथ लुधियाना रेलवे स्टेशन पहुंचे.
स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस पर हुई कार्रवाई
जिस समय यह कार्रवाई हुई, उस वक्त लुधियाना स्टेशन पर अमृतसर स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस खड़ी थी. अदालत के आदेश के तहत ट्रेन को कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू की गई. इस तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत कुछ समय के लिए यह ट्रेन संपूर्ण सिंह के पक्ष में कुर्क संपत्ति बन गई.
यही वजह है कि इस घटना को आम बोलचाल में इस तरह बताया जाता है कि एक किसान ‘स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस का मालिक’ बन गया था. हालांकि इसे समझना जरूरी है कि यह स्थायी मालिकाना हक नहीं था, बल्कि अदालत के आदेश के तहत बकाया रकम की वसूली के लिए की गई कुर्की की कार्रवाई थी.
कुछ ही समय में रेलवे ने ट्रेन छुड़ा ली
ट्रेन को ज्यादा देर तक स्टेशन पर रोके रखना संभव नहीं था. रेलवे की ओर से अदालत की प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की गई और रेलवे के सेक्शन इंजीनियर ने संबंधित कोर्ट अधिकारी के माध्यम से ट्रेन को छुड़वा लिया. इस तरह संपूर्ण सिंह के नाम ट्रेन का यह ‘मालिकाना’ दावा महज कुछ समय तक ही रहा. लेकिन इस घटना ने देशभर में खूब सुर्खियां बटोरीं और लोगों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बन गया कि आखिर एक किसान के बकाया मुआवजे के मामले में रेलवे की ट्रेन तक कैसे कुर्क हो गई.
मामला सिर्फ ट्रेन का नहीं, अधिकार का था
इस पूरी कहानी को केवल ‘एक किसान के ट्रेन का मालिक बनने’ के तौर पर देखना अधूरा होगा. असल विवाद जमीन अधिग्रहण के उचित मुआवजे को लेकर था. संपूर्ण सिंह का कहना था कि उनकी जमीन के लिए निर्धारित मुआवजा आसपास के क्षेत्र में दी गई रकम की तुलना में कम था. उन्होंने अदालत में अपनी बात रखी और लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया का सामना किया. अदालत के आदेश के बाद मुआवजे की राशि बढ़ाई गई और भुगतान में देरी होने पर रेलवे की संपत्ति की कुर्की का आदेश भी सामने आया.
रेलवे से जुड़े विवाद आम तौर पर जमीन अधिग्रहण, मुआवजा, नौकरी, दुर्घटना या यात्री सुविधाओं जैसे मुद्दों से जुड़े होते हैं. लेकिन किसी एक्सप्रेस ट्रेन को अदालत के आदेश के तहत कुर्क करने की घटना बेहद असामान्य थी. इसी वजह से संपूर्ण सिंह का मामला आज भी भारतीय रेलवे से जुड़ी चर्चित कानूनी घटनाओं में गिना जाता है. यह कहानी यह भी बताती है कि अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी जमीन का उचित मुआवजा नहीं दिया गया है, तो वह कानूनी प्रक्रिया के जरिए अपने अधिकार के लिए लड़ सकता है.
