2029 से पहले 21 राज्यों में UCC? 🇮🇳 अमित शाह के ऐलान के बाद क्यों उठा पूरे देश में समान कानून का सवाल?

समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को मुंबई में कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA के नेतृत्व वाली सरकारों वाले सभी 21 राज्यों में UCC लागू कर दिया जाएगा। इस बयान के बाद सवाल उठ रहा है कि अगर UCC इतना महत्वपूर्ण मुद्दा है, तो इसे पूरे देश में एक साथ क्यों नहीं लागू किया जा रहा….? दरअसल, इसके पीछे सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी पहलू भी जुड़े हैं। अलग-अलग राज्यों में UCC को लेकर अलग-अलग स्तर पर काम चल रहा है, जबकि देश में अभी केवल कुछ राज्यों ने इस दिशा में कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है।
क्या है UCC…..?
समान नागरिक संहिता का मतलब एक ऐसा समान कानूनी ढांचा है, जिसमें धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह नागरिक मामलों में समान नियम लागू हों। आमतौर पर UCC की चर्चा शादी, तलाक, गोद लेने, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और विरासत जैसे मामलों को लेकर होती है। फिलहाल भारत में इन विषयों से जुड़े कई मामलों में अलग-अलग धार्मिक और व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। UCC के समर्थकों का तर्क है कि इससे नागरिक कानूनों में समानता बढ़ेगी। वहीं विरोध करने वालों की चिंता धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ी है।
अनुच्छेद 44 में क्या कहा गया है…..?
UCC की संवैधानिक चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण आधार अनुच्छेद 44 है। संविधान के नीति निदेशक तत्वों में शामिल इस अनुच्छेद में राज्य से पूरे भारत में समान नागरिक संहिता के लिए प्रयास करने की बात कही गई है। नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति मौलिक अधिकारों से अलग है। संविधान का अनुच्छेद 37 इन्हें अदालतों द्वारा सीधे लागू कराने योग्य नहीं मानता। इसका मतलब यह है कि अनुच्छेद 44 सरकार को UCC की दिशा में प्रयास करने का संवैधानिक आधार देता है, लेकिन अपने आप कोई UCC कानून लागू नहीं कर देता। यही वजह है कि UCC को लागू करने के लिए विधायी प्रक्रिया जरूरी होती है।
केंद्र पूरे देश में सीधे UCC क्यों नहीं लागू कर रहा….?
यहां मामला संविधान के साथ-साथ राजनीति से भी जुड़ जाता है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दूसरे व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषय संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं। ऐसे विषयों पर संसद के साथ-साथ राज्य विधानसभाएं भी कानून बना सकती हैं। यही व्यवस्था राज्यों को अपने स्तर पर UCC से संबंधित कानून बनाने का रास्ता देती है। इसके अलावा NDA के भीतर भी UCC को लेकर सभी दलों की एक जैसी राय नहीं है। कुछ सहयोगी दल राष्ट्रीय स्तर पर UCC के विरोध में अपनी स्थिति जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में केंद्र के लिए पूरे देश में एक साथ कानून लाने के बजाय राज्य-दर-राज्य आगे बढ़ना राजनीतिक रूप से ज्यादा व्यावहारिक रास्ता माना जा रहा है।
अब तक किन राज्यों में UCC की दिशा में कदम बढ़े…..?
UCC को लेकर राज्यों की स्थिति एक जैसी नहीं है। उत्तराखंड इस मामले में सबसे आगे है। राज्य ने 2024 में UCC कानून पास किया और 2025 में इसे लागू कर दिया। इसे देश का पहला राज्य-स्तरीय UCC बताया जाता है। इसके बाद गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने भी इस दिशा में कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। हालांकि, इन राज्यों में कानून की मंजूरी, अधिसूचना और लागू होने की प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में हो सकती है। वहीं महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में UCC को लेकर ड्राफ्ट तैयार करने के लिए कमेटियां बनाई गई हैं। यानी इन राज्यों में अभी कानून लागू होने से पहले कई चरण बाकी हैं। अमित शाह के 2029 के लक्ष्य को देखते हुए NDA शासित बाकी राज्यों में भी आने वाले समय में UCC को लेकर गतिविधियां बढ़ सकती हैं।
जनजातीय क्षेत्रों को लेकर क्या स्थिति है…..?
UCC की चर्चा में जनजातीय समुदायों का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण है। देश के कई आदिवासी क्षेत्रों में विवाह, विरासत और सामाजिक जीवन से जुड़े पारंपरिक नियम लंबे समय से चले आ रहे हैं। खासकर संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। UCC को लेकर सरकार की ओर से कई बार संकेत दिया गया है कि जनजातीय परंपराओं और संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इन क्षेत्रों को अलग रखा जा सकता है। यही पहलू UCC के ‘पूरे देश में एक कानून’ वाले विचार को और जटिल बनाता है।
UCC को लेकर विरोध क्यों है…..?
UCC का विरोध करने वाले संगठनों और राजनीतिक दलों की मुख्य चिंता धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ी है। आलोचकों का तर्क है कि अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं को एक कानून के तहत लाने से उनकी पहचान और अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। वहीं UCC समर्थकों का कहना है कि नागरिक मामलों में समान कानून का उद्देश्य धार्मिक आस्था को खत्म करना नहीं, बल्कि कानून के सामने समानता सुनिश्चित करना है। एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा महिला अधिकारों का है। समर्थकों का कहना है कि विवाह, तलाक, भरण-पोषण और संपत्ति जैसे मामलों में समान नियम महिलाओं के अधिकारों को मजबूत कर सकते हैं। दूसरी ओर, आलोचक सवाल उठाते हैं कि समान कानून तैयार करते समय सभी समुदायों की परंपराओं और अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।
2029 तक 21 राज्यों का लक्ष्य कितना चुनौतीपूर्ण…..?
अमित शाह के बयान के अनुसार 2029 से पहले NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए हर राज्य में अलग-अलग राजनीतिक और विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा। कहीं ड्राफ्ट तैयार हो रहा है, कहीं विधेयक पारित हो चुका है और कहीं अभी राजनीतिक सहमति बननी बाकी है। इसके अलावा केंद्र और राज्यों के कानून, संवैधानिक अधिकार, जनजातीय संरक्षण और गठबंधन राजनीति जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहेंगे। इसलिए 2029 तक UCC का विस्तार सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि कानून, संविधान और राज्यों के बीच समन्वय की बड़ी प्रक्रिया होगी।
पूरे देश में UCC कब तक…..?
फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि पूरे भारत में एक समान नागरिक संहिता कब लागू होगी। केंद्र के सामने राजनीतिक सहमति बनाने के साथ-साथ अलग-अलग समुदायों और राज्यों की चिंताओं को संबोधित करने की चुनौती है। आने वाले वर्षों में UCC पर बहस और तेज होने की संभावना है। 2029 का लक्ष्य इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति में और महत्वपूर्ण बना सकता है। लेकिन अंतिम रूप से UCC का दायरा क्या होगा, किन समुदायों और क्षेत्रों को छूट मिलेगी और अलग-अलग राज्यों में इसके नियम कितने समान होंगे—इन सवालों के जवाब कानून बनने और लागू होने की प्रक्रिया के साथ ही स्पष्ट होंगे।
