सरकारी अस्पतालों में मरीजों की बड़ी परेशानी होगी कम!

सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना कई बार बीमारी से कम और व्यवस्था से ज्यादा जूझने जैसा हो जाता है। पर्ची बनवाने के लिए एक काउंटर, डॉक्टर के कमरे के लिए दूसरी जगह, जांच के लिए अलग विभाग और दवा लेने के लिए फिर किसी दूसरे काउंटर पर लाइन—इन सबके बीच मरीज और उसके परिजन अक्सर परेशान हो जाते हैं। खासकर बुजुर्गों, अकेले अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों और पहली बार किसी बड़े सरकारी अस्पताल में आने वाले लोगों के लिए यह प्रक्रिया और मुश्किल हो जाती है। इसी परेशानी को कम करने के लिए दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में ‘पेशेंट नेवीगेटर’ व्यवस्था शुरू करने की तैयारी है। शुरुआती चरण में इसका ट्रायल चुनिंदा अस्पतालों में किया जा सकता है। अगर व्यवस्था सफल रहती है तो आगे इसे दूसरे सरकारी अस्पतालों तक भी बढ़ाया जा सकता है।
क्या होता है पेशेंट नेवीगेटर?
पेशेंट नेवीगेटर को आसान भाषा में मरीज का ‘अस्पताल गाइड’ कहा जा सकता है। इसके तहत प्रशिक्षित स्टाफ या वॉलंटियर मरीजों की अस्पताल से जुड़ी प्रक्रियाओं में मदद करेंगे। मरीज को यह समझाने से लेकर कि पर्ची कहां बनेगी, किस डॉक्टर के पास जाना है, जांच किस विभाग में होगी और दवा कहां से मिलेगी—नेवीगेटर हर जरूरी चरण में मार्गदर्शन करेगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि नेवीगेटर मरीज का इलाज करेगा। उसका मुख्य काम मरीज को अस्पताल की जटिल प्रक्रिया समझाना और सही जगह तक पहुंचने में मदद करना होगा।
मान लीजिए कोई मरीज पहली बार सरकारी अस्पताल पहुंचता है। उसे यह नहीं पता कि रजिस्ट्रेशन कहां होगा और संबंधित डॉक्टर का कमरा किस दिशा में है। ऐसी स्थिति में पेशेंट नेवीगेटर सबसे पहले मरीज को सही रजिस्ट्रेशन काउंटर तक पहुंचने में मदद कर सकता है। इसके बाद डॉक्टर के कमरे या संबंधित विभाग की जानकारी दी जाएगी।
अगर डॉक्टर जांच लिखते हैं तो मरीज को जांच केंद्र तक पहुंचने में भी मार्गदर्शन मिलेगा। जांच के बाद रिपोर्ट दिखाने, दूसरे विभाग में जाने या दवा लेने की जरूरत पड़ने पर भी नेवीगेटर प्रक्रिया समझाने में मदद कर सकता है। इससे मरीज को हर कदम पर अलग-अलग लोगों से पूछताछ करने और अस्पताल में इधर-उधर भटकने की जरूरत कम हो सकती है।
दिल्ली में सबसे पहले होगा ट्रायल
इस व्यवस्था को सीधे सभी अस्पतालों में लागू करने के बजाय पहले पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर आजमाया जा सकता है। दिल्ली के कुछ चुनिंदा सरकारी अस्पतालों में पेशेंट नेवीगेटर तैनात किए जाने की योजना है। शुरुआती ट्रायल के दौरान यह देखा जाएगा कि मरीजों को इससे कितनी सुविधा मिलती है, अस्पताल की भीड़ और व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ता है और किस तरह की समस्याएं सामने आती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, एलएनजेपी, जीबी पंत और जीटीबी जैसे अस्पतालों में इस तरह की व्यवस्था के ट्रायल पर विचार किया जा रहा है। ट्रायल से मिलने वाले अनुभव और फीडबैक के आधार पर आगे की रणनीति तैयार की जा सकती है।
बुजुर्ग और अकेले मरीजों को सबसे ज्यादा फायदा
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हो सकता है जिन्हें अस्पताल की प्रक्रिया समझने में ज्यादा परेशानी होती है। बुजुर्ग मरीजों को अक्सर एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक जाने में दिक्कत होती है। वहीं अकेले आने वाले मरीजों के लिए रजिस्ट्रेशन, जांच और दवा की प्रक्रिया संभालना मुश्किल हो सकता है। ऐसे मरीजों को अगर शुरुआत से ही कोई प्रशिक्षित व्यक्ति सही दिशा दिखाए, तो उनका समय और ऊर्जा दोनों बच सकते हैं। गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिजनों के लिए भी यह व्यवस्था मानसिक तनाव कम करने में मददगार साबित हो सकती है।
डिजिटल तकनीक से भी आसान हो सकती है राह
पेशेंट नेवीगेटर व्यवस्था को डिजिटल सिस्टम के साथ जोड़ा जाए तो अस्पतालों में मरीजों की आवाजाही को और व्यवस्थित किया जा सकता है। डिस्प्ले बोर्ड, टोकन सिस्टम, डिजिटल हेल्प डेस्क और मोबाइल आधारित सेवाओं के जरिए मरीजों को उनकी बारी, विभाग और जरूरी प्रक्रिया की जानकारी दी जा सकती है।
इससे एक तरफ मरीजों को सही जानकारी मिलेगी, तो दूसरी तरफ अस्पताल प्रशासन को भी भीड़ और मरीजों की आवाजाही को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, डिजिटल सुविधाओं के साथ मानव सहायता की जरूरत बनी रह सकती है, क्योंकि हर मरीज तकनीकी सुविधाओं का इस्तेमाल करने में सहज नहीं होता।
अस्पतालों में भीड़ और भ्रम कम करने की उम्मीद
बड़े सरकारी अस्पतालों में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं। ऐसे में एक ही जगह पर भीड़ बढ़ने से मरीजों को सही जानकारी हासिल करने में परेशानी हो सकती है। कई बार मरीज गलत विभाग में पहुंच जाते हैं और फिर उन्हें दोबारा लाइन में लगना पड़ता है। इससे उनका समय भी जाता है और अस्पताल की व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
पेशेंट नेवीगेटर व्यवस्था का उद्देश्य इसी तरह की परेशानियों को कम करना है। अगर मरीज शुरुआत से ही सही विभाग और सही प्रक्रिया तक पहुंच सके, तो अनावश्यक आवाजाही कम हो सकती है।
