रीवा के गांधी स्मारक अस्पताल से सामने आई इस दर्दनाक घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मां, मुझे इन लोगों बचा लो…
मैं नहीं बचूंगी मां…
ये वो आखिरी शब्द थे,
जो एक मां ने अपनी बेटी के मुंह से सुने। ये किसी डरावनी कहानी का हिस्सा नहीं है। यह एक कड़वी, खौफनाक और दिल को झकझोर देने वाली हकीकत है, जो रीवा के गांधी स्मारक अस्पताल के प्रसूति वार्ड से गूंजी थी।
9 महीने की गर्भवती कल्पना मिश्रा अस्पताल के बेड पर तड़प रही थी, चीख रही थी, लेकिन उसकी चीखें व्यवस्था के बहरे कानों तक नहीं पहुंच सकीं। कुछ ही घंटों बाद… एक अजन्मे मासूम और उसकी मां की सांसें हमेशा के लिए थम गईं।
यह पूरा मामला मध्य प्रदेश के डिप्टी सीएम के गृह जिले रीवा का है, जहां लापरवाही की हदें पार हो गईं। 9 महीने से पेट में पल रहे अपने बच्चे को सीने से लगाने का सपना देखने वाली कल्पना को क्या पता था कि वह अपनी जिंदगी से दूर जाने वाली है। परिजनों का आरोप है कि इलाज में इतनी बड़ी लापरवाही बरती गई, जिसकी कीमत दो जिंदगियों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। कहा जा रहा है कि कल्पना को जरूरत से ज्यादा एनेस्थीसिया यानी बेहोशी की दवा दे दी गई। इसके साथ ही, जब दर्द से तड़पती महिला ने मदद की गुहार लगाई, तो वहां मौजूद नर्सिंग स्टाफ ने उसके साथ हमदर्दी दिखाने के बजाय दुर्व्यवहार किया। उसे चुप रहने को कहा गया, उसकी तड़प को नजरअंदाज किया गया।
जब यह चीखें अस्पताल की दीवारों को लांघकर बाहर आईं और हंगामा बढ़ा, तब जाकर शासन-प्रशासन की नींद टूटी। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर सोनल अग्रवाल, एनेस्थीसिया विभाग की डॉ. निधि पांडे, और नर्सिंग ऑफिसर साधना वर्मा व सीमा मुजालदे को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है। कुल 2 डॉक्टरों समेत 4 लोगों पर गाज गिरी है। डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि मरीजों और परिजनों से संवेदनशील व्यवहार जरूरी है। लापरवाही किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मामले की जांच के लिए 5 सदस्यीय कमेटी बना दी गई है।
दूसरी तरफ, अस्पताल प्रबंधन ने अपना पल्ला झाड़ते हुए एक अलग दलील पेश की है। अस्पताल का कहना है कि जब कल्पना को भर्ती कराया गया था, तब उसकी हालत पहले से ही बेहद गंभीर थी। उसका प्लेटलेट काउंट सिर्फ 30 हजार था, ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ था और लीवर एंजाइम भी गड़बड़ थे। उसे गंभीर प्री-एक्लेम्पसिया और हेल्प सिंड्रोम जैसी खतरनाक बीमारियां थीं। अस्पताल के मुताबिक, डॉक्टरों ने बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उसी रात पौने बारह बजे मां और बच्चे दोनों ने दम तोड़ दिया।
अब सवाल यह उठता है कि अगर मरीज की हालत इतनी गंभीर थी, तो उसे सही समय पर सही इलाज और संवेदनशीलता क्यों नहीं मिली? क्यों एक मरती हुई महिला को यह कहना पड़ा कि ये लोग मुझे मार डालेंगे? क्या हमारे सरकारी अस्पतालों के वार्ड जिंदगी देने के बजाय खौफ का दूसरा नाम बनते जा रहे हैं? पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आना अभी बाकी है, पांच सदस्यों की कमेटी जांच कर रही है। लेकिन इस जांच और सस्पेंशन से क्या वो उजड़ा हुआ संसार वापस आ पाएगा? क्या वो मां अपनी बेटी को दोबारा गले लगा पाएगी? या फिर हर बार की तरह यह मामला भी फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगा?इस दर्दनाक घटना पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि सिर्फ सस्पेंशन ही ऐसे मामलों का इलाज है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।
