SBI Loan Settlement: SBI के 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के दावे और वसूली के बीच बड़ा अंतर सामने आया है. RTI से मिले आंकड़ों में 309 लोन अकाउंट्स की जानकारी सामने आई....

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) से जुड़े लोन मामलों को लेकर एक RTI के जरिए चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले करीब 9 वित्त वर्षों में बैंक ने NCLT और दूसरे रिजॉल्यूशन फोरम के जरिए निपटाए गए कई बड़े लोन खातों में पूरी दावा राशि की वसूली नहीं की. यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है कि इसे सीधे तौर पर ‘SBI ने 1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर दिया’ कहना सही नहीं होगा. उपलब्ध आंकड़े मुख्य रूप से बैंक के कुल दावे और रिजॉल्यूशन प्रक्रिया के तहत हुई वसूली के बीच के अंतर यानी हेयरकट को दर्शाते हैं.
RTI में क्या सामने आया….?
मनीलाइफ की रिपोर्ट के मुताबिक, पुणे के एक्टिविस्ट विवेक वेलंकर की RTI याचिका से मिले आंकड़ों में 2017-18 से 2025-26 के बीच SBI के 309 लोन अकाउंट्स का डेटा सामने आया. इन खातों में बैंक का कुल दावा करीब 1,49,895 करोड़ रुपये था. रिजॉल्यूशन प्लान के जरिए बैंक को करीब 49,727 करोड़ रुपये की वसूली हुई. यानी बैंक के कुल दावे और प्राप्त राशि के बीच करीब 1,00,168 करोड़ रुपये का अंतर रहा. इसे रिजॉल्यूशन हेयरकट के तौर पर देखा जाता है, जो कुल दावे का लगभग 67 फीसदी बैठता है.
बैंक को सिर्फ एक-तिहाई रकम मिली….
आंकड़ों के अनुसार, इन 309 खातों में SBI को रिजॉल्यूशन प्रक्रिया के जरिए अपने कुल दावे की लगभग एक-तिहाई राशि ही वापस मिली. इसका मतलब यह नहीं है कि बैंक ने सभी मामलों में बाकी रकम को सीधे माफ कर दिया. NCLT जैसी दिवाला समाधान प्रक्रिया में किसी कंपनी की वित्तीय स्थिति, उपलब्ध संपत्ति और मंजूर किए गए रिजॉल्यूशन प्लान के आधार पर लेनदारों को मिलने वाली रकम तय होती है. इसी वजह से हेयरकट और लोन राइट-ऑफ को अलग-अलग समझना जरूरी है.
2025-26 में भी सामने आया बड़ा अंतर….
RTI से मिले आंकड़ों में वित्त वर्ष 2025-26 के कुछ मामलों का भी उल्लेख है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में SBI ने 30 ऐसे खातों का निपटारा किया, जिनमें बैंक का कुल दावा करीब 4,928 करोड़ रुपये था. इन मामलों में रिजॉल्यूशन के जरिए बैंक को करीब 1,348 करोड़ रुपये मिले. इस तरह दावा राशि और वसूली के बीच करीब 3,580 करोड़ रुपये का अंतर रहा, जिसे लगभग 73 फीसदी का हेयरकट बताया गया है.
राइट-ऑफ और हेयरकट में क्या अंतर है….?
लोन से जुड़े मामलों में ‘राइट-ऑफ’ और ‘हेयरकट’ को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, जबकि दोनों अलग-अलग चीजें हैं. रिजॉल्यूशन हेयरकट का मतलब बैंक या अन्य लेनदार के कुल दावे और रिजॉल्यूशन प्लान के तहत वास्तव में मिलने वाली रकम के बीच का अंतर है. वहीं टेक्निकल या प्रूडेंशियल राइट-ऑफ बैंक की अकाउंटिंग प्रक्रिया से जुड़ा होता है. इसमें बैंक अपनी बैलेंस शीट से ऐसे लोन को हटा सकता है, जिनकी वसूली मुश्किल मानी जा रही हो. इसका यह अर्थ नहीं होता कि कर्ज लेने वाले की कानूनी देनदारी अपने आप खत्म हो गई.
1 लाख करोड़ का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है….?
SBI देश के सबसे बड़े सरकारी बैंकों में शामिल है. ऐसे में इतने बड़े दावों और वास्तविक वसूली के बीच अंतर का आंकड़ा बैंकिंग सेक्टर में खराब कर्ज और उसकी रिकवरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है. NCLT के जरिए होने वाली रिकवरी का उद्देश्य मुश्किल में फंसी कंपनियों की परिसंपत्तियों और कारोबार को ध्यान में रखते हुए समाधान निकालना होता है. हर मामले में पूरी दावा राशि की वसूली संभव हो, यह जरूरी नहीं है. इसलिए सामने आए 1,00,168 करोड़ रुपये के अंतर को सीधे ‘कर्ज माफी’ कहना सही नहीं होगा. यह मुख्य रूप से रिजॉल्यूशन प्रक्रिया के दौरान बैंक के दावे और वास्तविक वसूली के बीच का अंतर है.
आम लोगों पर इसका क्या असर….?
SBI में बड़ी संख्या में आम लोगों की जमा राशि होती है और बैंक देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसलिए बड़े कॉरपोरेट लोन की रिकवरी और बैंक की वित्तीय स्थिति का असर व्यापक बैंकिंग सिस्टम पर पड़ सकता है. बैंक के लिए चुनौती यह रहती है कि फंसे हुए कर्ज से अधिक से अधिक रकम की वसूली की जाए और भविष्य में ऐसे जोखिमों को नियंत्रित किया जाए. वहीं, NCLT और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए लोन मामलों का समाधान इसी व्यापक रिकवरी प्रक्रिया का हिस्सा है.
नोट : इस खबर में बताए गए आंकड़े RTI से प्राप्त जानकारी और संबंधित रिपोर्ट के आधार पर हैं. ‘हेयरकट’, ‘राइट-ऑफ’ और ‘कर्ज माफी’ अलग-अलग अवधारणाएं हैं, इसलिए इनका अर्थ एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए…..
