
नई दिल्ली, 31 मार्च।
भारतीय खेल जगत के लिए ‘1 अप्रैल’ का दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उन दो असाधारण व्यक्तित्वों के जन्म का उत्सव है, जिन्होंने शारीरिक बाधाओं और उम्र की सीमाओं को तोड़कर दुनिया भर में तिरंगा फहराया। ये दो हस्तियां हैं— ‘टरबैन्ड टोर्नेडो’ फौजा सिंह और ‘गूंगा पहलवान’ के नाम से विख्यात वीरेंद्र सिंह। आइए, जानते हैं इनके प्रेरणादायक सफर के बारे में।
फौजा सिंह: 100 साल की उम्र में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाले धावक
1 अप्रैल 1911 को पंजाब के जालंधर में जन्मे फौजा सिंह की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। पांच साल की उम्र तक वे ठीक से चल भी नहीं पाते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
- सफर की शुरुआत: 80 के दशक के बाद अपनी पत्नी और बेटे को खोने के गम से उबरने के लिए उन्होंने दौड़ना शुरू किया।
- असाधारण रिकॉर्ड्स: 89 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली फुल मैराथन पूरी की। साल 2011 में, 100 वर्ष की आयु में उन्होंने एक ही दिन में आठ विश्व आयु वर्ग रिकॉर्ड बनाकर दुनिया को हैरान कर दिया।
- उपलब्धियां: वे लंदन 2012 ओलंपिक के टॉर्च बियरर रहे और उन पर ‘टरबैन्ड टोर्नेडो’ नामक जीवनी भी लिखी गई।
- दुखद अंत: 14 जुलाई 2025 को 114 वर्ष की आयु में एक सड़क दुर्घटना में इस महान धावक का निधन हो गया, जिससे खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई थी।
वीरेंद्र सिंह: मूक-बधिर होने के बावजूद कुश्ती के बेताज बादशाह
हरियाणा के भिवानी में 1 अप्रैल 1986 को जन्मे वीरेंद्र सिंह ने साबित किया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो खामोशी भी दहाड़ बन सकती है। मूक-बधिर (Deaf and Mute) होने के कारण बचपन में उन्हें काफी उपहास सहना पड़ा, लेकिन उन्होंने अखाड़े को अपनी ताकत बनाया।
- स्वर्णमयी उपलब्धियां: वीरेंद्र ने डेफलिम्पिक्स (Deaflympics) में तीन स्वर्ण पदक (2005, 2013, 2017) और एक कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। 2016 में उन्होंने वर्ल्ड डेफ रेसलिंग चैंपियनशिप का खिताब भी अपने नाम किया।
- सम्मान: उनकी अद्भुत खेल प्रतिभा के लिए भारत सरकार ने उन्हें साल 2015 में ‘अर्जुन पुरस्कार’ और 2021 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा।
- संघर्ष की कहानी: छत्रसाल स्टेडियम और गुरु हनुमान अखाड़े से निकले इस पहलवान की कहानी पर ‘गूंगा पहलवान’ नाम की डॉक्यूमेंट्री भी बनी, जिसने उनके संघर्ष को दुनिया के सामने रखा।
ये दोनों ही खिलाड़ी इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि इंसान अपनी कमियों को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना सकता है। खेल जगत हमेशा इनके योगदान का ऋणी रहेगा।
