60 घंटे तक मलबे में दबी रही 6 साल की मनीषा, फिर सुनाई दी जिंदगी की आवाज!

क्या कोई 6 साल का बच्चा बिना हवा, बिना पानी और टन मलबे के नीचे दबे रहकर तीन दिनों तक ज़िंदा रह सकता है? सुनने में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है, लेकिन नेपाल के रसुवा ज़िले में यह चमत्कार हकीकत में बदला है। जब भारी लैंडस्लाइड और सैलाब ने सब कुछ तबाह कर दिया, तब मलबे के ढेर के नीचे से एक ऐसी आवाज़ आई जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। यह कहानी है 6 साल की मासूम मनीषा मगर की, जिसने काल को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
26 अगस्त की वो शाम नेपाल के सीमावर्ती शहर तिमुरे के लोगों के लिए किसी कयामत से कम नहीं थी। भारी मानसूनी बारिश और पहाड़ों पर ग्लेशियर फटने की वजह से अचानक भयानक बाढ़ और लैंडस्लाइड शुरू हो गया। देखते ही देखते बड़े-बड़े पहाड़ दरकने लगे और पत्थरों-कीचड़ के सैलाब ने हंसते-खेलते घरों को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया। इसी मलबे के नीचे कहीं दफन हो गई 6 साल की नन्ही मनीषा।
एक तरफ बाहर तबाही का मंजर था, तो दूसरी तरफ टन वजनी कीचड़ और कंक्रीट के नीचे दबी मनीषा के लिए समय थम सा गया था। चारों तरफ सिर्फ घना अंधेरा, सांस लेने की जद्दोजहद और रूह कंपा देने वाली ठंड। एक-एक सेकंड सदियों जैसा बीत रहा था। एक दिन बीता, दूसरा दिन बीता… भूख, प्यास और डर से बेहाल मासूम सिर्फ अपनी मां को याद कर रही थी। बाहर सबको लग रहा था कि अब कोई उम्मीद नहीं बची, लेकिन उस 6 साल की बच्ची के भीतर ज़िंदा रहने की ज़िद बाकी थी।
लगभग 60 घंटे बीत चुके थे। 28 अगस्त की शाम को नेपाल की आर्म्ड पुलिस फोर्स APF के 6 जांबाज जवान तिमुरे के उसी मलबे पर रेस्क्यू ऑपरेशन चला रहे थे। हर तरफ सन्नाटा था। तभी अचानक एक जवान को ज़मीन के नीचे से बहुत ही धीमी, सिसकती हुई रोने की आवाज़ सुनाई दी। जवानों के कान खड़े हो गए। उन्होंने तुरंत बिना मशीनों के, अपने हाथों से कीचड़ और मलबे को हटाना शुरू किया। हर एक सेकंड कीमती था। जैसे ही कंक्रीट का एक बड़ा हिस्सा हटा, वहां का नजारा देखकर जवानों की आंखें नम हो गईं। सिर से पैर तक कीचड़ में लिपटी, मलबे के बीच फंसी मनीषा की दो छोटी-छोटी आंखें टकटकी लगाए जवानों को देख रही थीं। वह ज़िंदा थी! ढाई दिन तक क़यामत की कैद में रहने के बाद आखिरकार उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
मनीषा को तुरंत एयरलिफ्ट करके काठमांडू के अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने जब उसकी जांच की तो वह भी हैरान रह गए—इतने बड़े हादसे के बाद भी मासूम को सिर्फ कुछ खरोंचें आई थीं। और इस चमत्कार का सबसे खूबसूरत मोड़ तब आया, जब मनीषा को उसके माता-पिता से मिलाया गया, जो इस आपदा में सुरक्षित बच गए थे। यह सिर्फ एक रेस्क्यू की कहानी नहीं है, यह कहानी है उस उम्मीद की जो कभी नहीं मरती। मनीषा की ये तस्वीरें आज पूरी दुनिया को सिखा रही हैं कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर हौसला और दुआएं साथ हों, तो मौत के मुंह से भी ज़िंदगी को वापस छीना जा सकता है।
