रायबरेली में कांग्रेस की वापसी होगी? राहुल गांधी के सामने 2027 में सिर्फ चुनाव जीतने नहीं, बल्कि पार्टी का खोया जनाधार वापस लाने की बड़ी चुनौती है। क्या लौटेंगे कांग्रेस के पुराने 'सुनहरे दिन'?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में रायबरेली सिर्फ एक लोकसभा सीट नहीं है। यह लंबे समय से गांधी परिवार और कांग्रेस की सियासत का अहम केंद्र रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने यहां से बड़ी जीत दर्ज की, जिसके बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई उम्मीद जगी। अब नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है, जहां राहुल गांधी के सामने अपनी लोकसभा जीत को कांग्रेस के लिए विधानसभा स्तर की सफलता में बदलने की बड़ी चुनौती होगी। राहुल गांधी सांसद बनने के बाद लगातार रायबरेली का दौरा कर रहे हैं। हालिया दौरे में उन्होंने व्यापारियों, विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों और पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। इन मुलाकातों को सिर्फ स्थानीय संवाद नहीं, बल्कि 2027 की चुनावी तैयारी के लिहाज से भी देखा जा रहा है।
लोकसभा में बड़ी जीत, लेकिन विधानसभा में कांग्रेस का सूखा…..
रायबरेली में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि राहुल गांधी की लोकप्रियता को पार्टी संगठन की चुनावी ताकत में कैसे बदला जाए। 2022 के विधानसभा चुनाव में जिले की किसी भी विधानसभा सीट पर कांग्रेस जीत हासिल नहीं कर सकी थी। वर्तमान विधानसभा तस्वीर में भी कांग्रेस के पास कोई विधायक नहीं है। रायबरेली जिले में कुल छह विधानसभा सीटें हैं—रायबरेली सदर, हरचंदपुर, बछरावां, सरेनी, ऊंचाहार और सलोन। यानी एक तरफ गांधी परिवार का मजबूत राजनीतिक जुड़ाव है, तो दूसरी तरफ विधानसभा स्तर पर कांग्रेस की जमीन कमजोर दिखाई देती है।
सोनिया गांधी के दौर की याद क्यों आ रही है…..?
रायबरेली में कांग्रेस के पुराने प्रभाव की चर्चा होती है तो सोनिया गांधी का दौर भी याद किया जाता है। 2004 में सोनिया गांधी के रायबरेली से सांसद बनने के बाद 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिले में शानदार प्रदर्शन किया था। उस समय पार्टी के टिकट पर पांच विधायक चुनाव जीते थे, जबकि रायबरेली सदर से निर्दलीय अखिलेश सिंह विधायक बने थे। इसके बाद कांग्रेस का प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया। 2012 में पार्टी अपना खाता नहीं खोल सकी और 2022 में भी जिले की सभी विधानसभा सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा। यही वजह है कि अब राहुल गांधी के सामने सिर्फ चुनाव जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि कांग्रेस के पुराने संगठनात्मक प्रभाव को फिर से खड़ा करने की चुनौती भी है।
राहुल गांधी खुद संभाल रहे हैं मोर्चा……
रायबरेली में राहुल गांधी की सक्रियता को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। वह हर कुछ महीनों में अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं और अलग-अलग वर्गों के लोगों से सीधे संवाद कर रहे हैं। हालिया दौरे में व्यापारियों ने महंगाई, बाजार में घटती खरीद क्षमता और कारोबार से जुड़ी समस्याएं उनके सामने रखीं। राहुल गांधी ने उनकी समस्याओं को संसद और सड़क तक उठाने का भरोसा दिया। इससे साफ है कि कांग्रेस रायबरेली में केवल पारंपरिक वोट बैंक पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है।
सपा के साथ गठबंधन बना सकता है नया समीकरण……
2027 के चुनाव में कांग्रेस की रणनीति का एक अहम हिस्सा समाजवादी पार्टी के साथ संभावित गठबंधन भी हो सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन किया था। लेकिन विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारा आसान नहीं होगा। रायबरेली की कई विधानसभा सीटों पर सपा का मौजूदा प्रभाव है। ऐसे में अगर गठबंधन कायम रहता है तो कांग्रेस को अपनी पसंद की सीटें हासिल करने के लिए सपा के साथ तालमेल बैठाना होगा। यहां सीट शेयरिंग का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस को अपने संगठन को मजबूत करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक जमीन चाहिए, जबकि सपा अपनी जीती हुई सीटों पर समझौता करने से पहले कई बार सोचेगी।
बीजेपी के सामने भी बड़ी चुनौती…..
रायबरेली में मुकाबला सिर्फ कांग्रेस और सपा के बीच नहीं होगा। बीजेपी भी इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगी। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने रायबरेली सदर और सलोन सीट पर जीत दर्ज की थी, जबकि बाकी सीटों पर सपा के उम्मीदवार विजयी हुए थे। हालांकि, ऊंचाहार से सपा विधायक मनोज पांडेय बाद में बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में 2027 में मुकाबला सिर्फ पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों के बीच भी होगा।
राहुल गांधी के सामने असली परीक्षा क्या है…..?
राहुल गांधी के लिए चुनौती यह है कि 2024 की लोकसभा जीत को 2027 में विधानसभा स्तर पर कांग्रेस की जीत में कैसे बदला जाए।
इसके लिए तीन चीजें बेहद अहम होंगी—
पहली, कांग्रेस का बूथ स्तर का संगठन कितना मजबूत होता है।
दूसरी, सपा के साथ गठबंधन होता है तो सीटों का बंटवारा कितना प्रभावी रहता है।
तीसरी, राहुल गांधी की स्थानीय सक्रियता कितनी दूर तक पार्टी के उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं के पक्ष में वोट में बदल पाती है।
2024 में राहुल गांधी को रायबरेली लोकसभा क्षेत्र के पांचों विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। कांग्रेस के लिए यही प्रदर्शन 2027 की उम्मीद का आधार बना हुआ है।
क्या लौटेंगे कांग्रेस के ‘सुनहरे दिन’…..?
रायबरेली में कांग्रेस के लिए 2027 का चुनाव महज सत्ता की लड़ाई नहीं है। यह पार्टी के पुराने राजनीतिक आधार को दोबारा खड़ा करने की परीक्षा भी है। राहुल गांधी के सामने अब सवाल यह नहीं है कि वह रायबरेली से लोकसभा चुनाव जीत सकते हैं या नहीं। वह साबित हो चुका है। असली सवाल यह है कि क्या वह अपनी लोकसभा जीत की ताकत को विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की वापसी में बदल पाएंगे? अगर कांग्रेस मजबूत संगठन तैयार करती है, स्थानीय मुद्दों को चुनावी अभियान के केंद्र में रखती है और गठबंधन की रणनीति सही बैठती है, तो 2027 में पार्टी के लिए रायबरेली में लंबे समय बाद खाता खोलने की संभावना बन सकती है। लेकिन फिलहाल ‘सोनिया वाला दौर’ लौटने का दावा करना जल्दबाजी होगी। इसका फैसला जनता 2027 के विधानसभा चुनाव में करेगी।
