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ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती चिंता के बीच मंगलवार को तेहरान में एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय बैठक होने जा रही है। इस बैठक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को केंद्र में रखकर चीन, रूस और ईरान भाग लेंगे। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने सोमवार को इसकी घोषणा की। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर वैश्विक राजनीति में अस्थिरता बढ़ गई है और कई देश इसे लेकर सक्रिय रूप से कूटनीतिक प्रयासों में लगे हुए हैं।
बैठक का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
इस त्रिपक्षीय बैठक का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सहयोग, पारदर्शिता और क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा करना है। रूसी सरकारी मीडिया तास की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी विदेश मंत्रालय ने अभी तक बैठक में शामिल होने वाले प्रतिनिधियों के नामों की औपचारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि यह बैठक मंत्री स्तर से नीचे के अधिकारियों के बीच होगी।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर यह बैठक 25 जुलाई को इस्तांबुल में होने वाली एक और अहम बैठक से पहले हो रही है, जिसमें ईरान और यूरोप के तीन बड़े देश—फ्रांस, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम (E3) हिस्सा लेंगे।
ईरान-इजरायल टकराव और परमाणु विवाद की नई लहर
13 जून को इजरायल ने आरोप लगाया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के तहत अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का इस्तेमाल हो रहा है, जो परमाणु हथियार निर्माण की दिशा में एक गंभीर कदम है। इसके बाद इजरायल ने ईरान के खिलाफ एक सैन्य अभियान छेड़ दिया। इजरायली आईडीएफ ने तेहरान के परमाणु प्रतिष्ठानों, सैन्य ठिकानों और हवाई अड्डों को निशाना बनाया।
इस हमले में ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई प्रमुख वैज्ञानिकों और IRGC के सैन्य अधिकारियों को जान गंवानी पड़ी। ईरान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इजरायली हवाई क्षेत्र में ड्रोन हमले के जरिए जवाबी कार्रवाई की।
अमेरिका की भूमिका और हमला

22 जून को अमेरिका ने भी अपने रुख को स्पष्ट करते हुए ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े तीन प्रमुख ठिकानों—नतांज़, इस्फ़हान और फोर्डो—पर सैन्य कार्रवाई की। यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु प्रयासों के खिलाफ सीधा हस्तक्षेप किया हो। इससे पहले भी अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प्रतिबंध और राजनयिक दबाव बनाया है।
ईरान ने जवाब में कतर में स्थित अमेरिकी अल उदीद हवाई अड्डे पर हमला किया लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि वह युद्ध को आगे नहीं बढ़ाना चाहता।
अस्थिर युद्धविराम और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
ईरान और इजरायल के बीच मौजूदा स्थिति एक अस्थिर युद्धविराम की तरह है। दोनों पक्षों ने फिलहाल पीछे हटने का संकेत दिया है लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर आशंकाएं अभी भी बनी हुई हैं। अमेरिका, रूस और चीन सहित विश्व के कई शक्तिशाली देश अब इस विवाद को राजनयिक तरीकों से सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।

तेहरान की त्रिपक्षीय बैठक का रणनीतिक महत्व
इस त्रिपक्षीय बैठक का समय और स्थान इस बात को दर्शाता है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अब चीन और रूस भी सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं। खासकर तब, जब पश्चिमी देश ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बनाने की नीति पर काम कर रहे हैं। तेहरान की यह बैठक संभावित रूप से फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के साथ 25 जुलाई को इस्तांबुल में होने वाली वार्ता की दिशा तय कर सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक ईरान को वैश्विक मंच पर समर्थन दिलाने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है, जिससे वह अपने परमाणु कार्यक्रम को एक ‘शांतिपूर्ण’ प्रयास के रूप में प्रस्तुत कर सके।
रूस और चीन की भूमिका
रूस और चीन शुरू से ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देशों के दृष्टिकोण से भिन्न राय रखते आए हैं। दोनों देशों का मानना है कि ईरान को परमाणु तकनीक का सीमित और नागरिक उपयोग करने का अधिकार है। रूस और चीन इस बैठक में इस बात पर जोर दे सकते हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ना चाहिए, न कि दबाव और सैन्य कार्रवाई के जरिए।
संभावित परिणाम और आगे की रणनीति
तेहरान में हो रही यह त्रिपक्षीय बैठक आने वाले दिनों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर वैश्विक रणनीति की दिशा तय कर सकती है। यदि यह बैठक सफल होती है, तो इससे क्षेत्रीय स्थिरता में सुधार हो सकता है और ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में कुछ नरमी भी देखने को मिल सकती है।
निष्कर्ष
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर हो रही यह त्रिपक्षीय बैठक केवल तीन देशों के बीच संवाद नहीं है, बल्कि यह वैश्विक परमाणु कूटनीति का एक नया अध्याय है। तेहरान से लेकर इस्तांबुल तक, आने वाले सप्ताहों में लिए गए निर्णय भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
