
मुंबई, 31 मार्च।
सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ समाज में बदलाव लाने का एक बेहद मजबूत जरिया भी है। ऐसी फिल्में जो इंसान की सोच, व्यवहार और जीवन के प्रति नजरिए को बदलने की क्षमता रखती हैं, उनका गहरा असर होता है। इसी सोच के साथ अब एक सराहनीय पहल सामने आई है, जिसमें एक चर्चित फिल्म को जेलों में बंद कैदियों को दिखाने की तैयारी की जा रही है।
अपराधियों के सुधार पर आधारित है फिल्म ’23’
यह फिल्म है ’23’, जिसे निर्देशक राज राचकोंडा ने बेहद संवेदनशीलता के साथ बनाया है। इस पहल की जानकारी तेलंगाना की जेल विभाग की महानिदेशक (DG) सौम्या मिश्रा ने एक सम्मान समारोह के दौरान साझा की। उन्होंने फिल्म की तारीफ करते हुए कहा:
“यह फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि इसमें समाज के एक महत्वपूर्ण पहलू और अपराधियों के सुधार को बहुत जिम्मेदारी के साथ दिखाया गया है। फिल्म को जिस गंभीरता के साथ पेश किया गया है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है।”
‘द शॉशैंक रिडेम्पशन’ से हुई तुलना
सौम्या मिश्रा ने खुद फिल्म देखने के बाद अपने अनुभव साझा करते हुए इसकी तुलना मशहूर हॉलीवुड क्लासिक फिल्म ‘द शॉशैंक रिडेम्पशन’ से की। उन्होंने कहा कि अब तक फिल्मों में जेल की जिंदगी और सुधार की प्रक्रिया को इतनी सच्चाई और गहराई से नहीं दिखाया गया था।
डीजी ने आगे कहा:
“’23’ एक गंभीर और प्रेरणादायक फिल्म है। अगर इस फिल्म को देखने के बाद कैदियों के विचारों में थोड़ा भी सकारात्मक बदलाव आता है, तो यह अपने आप में एक बड़ी सफलता होगी। इसी उद्देश्य से हमने जेलों में इस फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग कराने का फैसला लिया है।”
क्या है फिल्म ’23’ की कहानी?
फिल्म ’23’ की कहानी मुख्य रूप से अपराध और सुधार के चक्र के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे परिस्थितिवश कुछ लोग गलत रास्ते पर चले जाते हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन और आत्म-मंथन के जरिए उनके जीवन को फिर से संवारा जा सकता है।
यह फिल्म पिछले साल रिलीज हुई थी और इसे दर्शकों के साथ-साथ फिल्म समीक्षकों से भी जबरदस्त सराहना और कई अवॉर्ड्स मिल चुके हैं। अब जेलों में इसकी स्क्रीनिंग के जरिए प्रशासन कैदियों के भीतर एक नई उम्मीद जगाने की कोशिश कर रहा है।
