पटना हाईकोर्ट के फैसले पर विवाद

पटना हाईकोर्ट की एक हालिया टिप्पणी ने देशभर में कानूनी और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। अदालत ने एक पुराने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि केवल किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना या उसकी छाती दबाना, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर, बलात्कार के प्रयास को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं और कई लोगों ने फैसले की आलोचना की। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतें भावनाओं के बजाय कानून में निर्धारित परिभाषाओं और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देती हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारतीय कानून में बलात्कार और बलात्कार के प्रयास की कानूनी परिभाषा क्या है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद बिहार के बांका जिले के अमरपुर में साल 2008 में हुई एक घटना से जुड़ा है. एक युवती अपने पिता के साथ स्टूडियो में फोटो खिंचाने के लिए गई थी, जहां स्टूडियो संचालक ने पिता को बाहर भेजकर दरवाजा बंद कर लिया. आरोपी ने अंदर युवती के साथ जबरदस्ती करते हुए उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाई, लेकिन जब लड़की ने शोर मचाया तो वह भाग निकला.
इस मामले में निचली अदालत से दोषी पाए गए शख्स की अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य या कृत्य स्पष्ट नहीं है, जिससे बलात्कार के प्रयास का अपराध सिद्ध हो सके और इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया.
ऐसे में सवाल यह है कि अगर किसी महिला की इजाजत के बिना उसकी छाती दबाना या फिर सलवार उतारना रेप की परिभाषा में नहीं आता है तो फिर आखिर बलात्कार की परिभाषा है क्या?
कानून के तहत क्या है बलात्कार की परिभाषा?
इस पूरे विवाद के बीच यह समझना जरूरी है कि देश की अदालतें भावनाओं पर नहीं, बल्कि लिखित कानून की परिभाषा पर काम करती हैं. देश के कानून के तहत भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के तहत बलात्कार तब माना जाता है, जब कोई पुरुष किसी महिला की इच्छा के बिना उसके शरीर के गुप्त अंगों (योनि या गुदा) में अपने लिंग का प्रवेश कराता है. इसके अलावा किसी वस्तु या उंगली को महिला के निजी अंगों में डालना या उसके निजी अंगों पर मुंह लगाना भी इसी दायरे में आता है.
सहमति को कानून कैसे देखता है?
भारतीय कानून में सहमति यानी कंसेंट को बेहद बारीकी से समझाया गया है, ताकि किसी के भी साथ नाइंसाफी न हो. कानून कहता है कि सहमति का मतलब महिला कि अपनी मर्जी से दी गई स्पष्ट हां है, जिस पर किसी भी प्रकार का डर, लालच या फिर दबाव न हो. अगर कोई महिला डर के मारे विरोध नहीं कर पाती है या फिर रोने-चिल्लाने की स्थिति में नहीं होती है, तो अदालत उसे उसकी रजामंदी बिल्कुल नहीं मानती है.
इसके अलावा:
- 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की की सहमति कानूनी रूप से मान्य नहीं होती।
- नशे की हालत में दी गई सहमति को भी चुनौती दी जा सकती है।
- मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति की सहमति को भी कानून अलग दृष्टि से देखता है।
