प्रस्तावना

भारत ऊर्जा संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से निवेश बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में, ग्रीन हाइड्रोजन एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें भारत दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है। एसएंडपी ग्लोबल की हालिया रिपोर्ट ने इस संभावना को मजबूत किया है, जिसमें कहा गया है कि भारत आने वाले वर्षों में लो-कॉस्ट ग्रीन हाइड्रोजन आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर सकता है।
यह विस्तृत लेख आपको बताएगा कि भारत की यह क्षमता किन कारणों से है, सरकार और निजी क्षेत्र क्या प्रयास कर रहे हैं, और ग्रीन हाइड्रोजन का भविष्य कैसा दिखता है।
ग्रीन हाइड्रोजन क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
- ग्रीन हाइड्रोजन पानी से हाइड्रोजन निकालने की प्रक्रिया है, जिसमें ऊर्जा स्रोत पूरी तरह से नवीकरणीय (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) होता है।
- यह शून्य कार्बन उत्सर्जन वाला ईंधन है, जिसे औद्योगिक उत्पादन, परिवहन, बिजली और घरेलू उपयोगों में लागू किया जा सकता है।
- हाइड्रोजन को भविष्य का “ईंधन ऑफ द फ्यूचर” कहा जाता है क्योंकि यह जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को घटाता है और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करता है।
भारत की ग्रीन हाइड्रोजन क्षमता
1. भौगोलिक लाभ
भारत के पास प्रचुर मात्रा में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के संसाधन हैं। इनका उपयोग हाइड्रोजन उत्पादन की लागत को अन्य देशों की तुलना में काफी कम कर सकता है।
2. सरकारी मिशन और नीतियां
- नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (₹19,744 करोड़ का बजट, जनवरी 2023)
- लक्ष्य: 2030 तक 50 लाख मीट्रिक टन वार्षिक उत्पादन
- वैश्विक व्यापार में 10% हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य।
3. वैश्विक निर्यात की संभावना
भारत से यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को हाइड्रोजन निर्यात करने की क्षमता है। इन देशों की नीतियां पहले से ग्रीन एनर्जी पर केंद्रित हैं और भारत उनकी ज़रूरतों को पूरा कर सकता है।
हालिया सरकारी पहलें
1. हाइड्रोजन राजमार्ग
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सितंबर 2025 में भारत के पहले हाइड्रोजन राजमार्गों का शुभारंभ किया।

- उद्देश्य: लंबी दूरी के माल ढुलाई वाहनों के लिए हाइड्रोजन ईंधन स्टेशन स्थापित करना।
- इससे परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी।
2. स्टार्ट-अप्स और इनोवेशन को बढ़ावा
सरकार ने हाल ही में ₹100 करोड़ का इनोवेशन फंड लॉन्च किया है।
- हर प्रोजेक्ट को ₹5 करोड़ तक का समर्थन मिलेगा।
- इसमें हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण, परिवहन और उपयोग से जुड़ी नई तकनीकें शामिल होंगी।
उद्योग और निजी क्षेत्र की भूमिका
- अदानी समूह और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसे बड़े उद्योग ग्रीन हाइड्रोजन में बड़े निवेश कर रहे हैं।
- टाटा पावर और एनटीपीसी ने भी ग्रीन हाइड्रोजन पायलट प्रोजेक्ट्स शुरू किए हैं।
- इन प्रयासों से लागत घटेगी और भारत में घरेलू उत्पादन मजबूत होगा।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
- यूरोपीय संघ: 2030 तक 10 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन का लक्ष्य।
- जापान और दक्षिण कोरिया: हाइड्रोजन आधारित कार और परिवहन तकनीकों में बड़े निवेश।
- चीन: ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में सबसे बड़ा निवेशक।
भारत अगर अपनी लो-कॉस्ट रणनीति को बनाए रखता है तो इन देशों के लिए एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन सकता है।
चुनौतियां
- उच्च प्रारंभिक निवेश – ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स के लिए भारी पूंजी चाहिए।
- इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी – हाइड्रोजन भंडारण और परिवहन के लिए तकनीकी समाधान अभी शुरुआती स्तर पर हैं।
- ग्लोबल प्रतिस्पर्धा – चीन, अमेरिका और यूरोप पहले से इस क्षेत्र में आगे हैं।
- तकनीकी मानकीकरण – अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए यूनिवर्सल स्टैंडर्ड्स का होना जरूरी है।
अवसर
- भारत 2030 तक 5 मिलियन नौकरियां पैदा कर सकता है।
- विदेशी निवेश और तकनीकी सहयोग से ग्रीन हाइड्रोजन इकोसिस्टम विकसित होगा।
- यह भारत को नेट-जीरो 2070 लक्ष्य हासिल करने में बड़ी मदद करेगा।
निष्कर्ष
भारत ग्रीन हाइड्रोजन इंडस्ट्री में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। मजबूत सरकारी नीतियों, निजी निवेश और भौगोलिक लाभों के चलते देश दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे सस्ता ग्रीन हाइड्रोजन आपूर्तिकर्ता बनने की क्षमता रखता है। अगर भारत ने सही रणनीति अपनाई और वैश्विक बाजार से तालमेल बनाया, तो आने वाले दशक में भारत ग्रीन एनर्जी सुपरपावर बन सकता है।
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